भोले बाबा की शरण में -भाग २
हमने मानिकपुर पहुंच कर, सब बड़ों के चरण स्पर्श कर आशिर्वाद प्राप्त कर, बाबूजी को १२०रुपये दिए जो हमको वजीफे में मिले थे। उन्होंने पूछा इतने रुपए कहां से लाए तो हमने बताया कि ये हमारे वजीफा के रूपये है,यह जान कर वो बहुत खुश हुए और बोले इन्हें अपने पास रख लो जब बनारस जाना तो अपने पसंद का सामान खरीद लेना। हमने वो रुपए अम्मा के पास रख दिए।हमको बहुत दिन बाद देख कर सब लोग बहुत खुश थे।हम भी सबसे मिल कर खुश थे । दूसरे दिन पुराने दोस्तों से मिले एक दूसरे का हाल चाल जाना। बच्चे कालेज की हास्टल की और जिमनास्टिक की कहानियां पूछते और बड़े हमारी पढ़ाई खाना-पीना और गंगा स्नान और विश्व नाथ जी दर्शन के बारे जानना चाहा रहे थे। हमने सबको उनके हिसाब से कहानियां सुनाईं और बातें बताई। छुट्टियों अच्छी कट रही थी। अम्मा हमें प्रतिदिन अपनी चक्रवर्ती किताब से एक या दो प्रश्न जरूर देती जिन्हें हमे साल्व् करना पड़ता था।हल न कर पाने उनसे पूछना पड़ता था वो तुरंत हल कर देती और हमे समझाती कि हम कंहा गलती कर रहे थे। बाबूजी बीड़ी के पत्ते के ठेका लिये थे। रोज़ सुबह वो जीप से अपने रक्षकों के साथ जंग...