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अगस्त, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लौट के चन्दू घर को आये

एक वर्ष परेशानी, तनाव  और संघर्ष में बड़ी मुश्किल से बीता। उरई में बीते एक साल ने मेरे आत्म विश्वास और मनोवैज्ञानिक सोच विचार तथा मेरे व्यवहार बहुत ख़राब असर डाला। बदनामी और ग़लत ख़बरें की गति बहुत तेज होती है। मेरे इलाहाबाद पहुंचने से पहले उरई कांड की खबर,आधे शहर में और मेरे जान-पहचाना के लोगों तक पहले पहुंच गयी थी।जो मिलता वह हाल-चाल पूछने से पहले पूछता चन्दूभाई का हुआ उरई वाले केस में,सब ठीक ठाक हो गया ना। हमारे लायक कौनो काम हो तो बताओ।हमारा नाम वैसे भी `बहुत भले लोगो' था, एक और तगमा लग गया। खैर हम इन्टरमीडिएट मैथ्स और साइंस से पास हो गये और इलाहाबाद पहुंचे कर हमारा एडमिशन C M P डिग्री कालेज में B S c फर्स्ट इयर करा दिया गया। हमारे मित्र कुंवर भी वहां मिल गये वो हमारे क्लास में ही थे। बड़े भैया की शादी हो जाने के कारण यह महसूस किया गया कि जिस घर में हमारा परिवार किराये पर रहता है,वह छोटा है तथा लड़कियों के कालेज से दूर है। इसलिए बाबूजी ने एक बड़ा मकान जो दो मंजिला था जिसमें सब के लिए पर्याप्त स्थान था तथा कई कमरे थे, किराए पर लिया, जिसका हाउस नंबर १०० था। यह मकान आगे चलकर हमारे...

चन्दू

 मई माह समाप्त हो गया। जून का महीना आते ही दिल की धड़कन बढ गई कि हाई स्कूल का रिजल्ट जाने कब आ जायेगा। रोज रेलवे स्टेशन जाते और ए यच व्हीलर की किताब की दुकान पर पता लगाते की हाई स्कूल का रिजल्ट कब आएगा। उससे निवेदन करते कि रिज़ल्ट के दिन एक एक्स्ट्रा कापी हमारे लिए मंगा ले । आज का जमाना तो था नहीं,न कम्प्यूटर, न इन्टर नेट, बस अखबार में रिजल्ट छपता था और उस दिन अखबार की कीमत बीस गुना बढ़ जाती थी। यू पी में तब केवल एक ही बोर्ड होता था और पूरे प्रदेश में करीब अस्सी हजार छात्र हाई स्कूल एक्जाम देते थे । खैर इन्तजार ख़त्म हुआ,एक दिन हाई स्कूल का रिजल्ट आ ही गया। ए एच व्यीलर की दुकान पर बहुत भीड़ थी फिर भी थोड़ी कोशिश के बाद हमको अखबार की एक कापी मिल गयी। हमने अपना रोल नंबर देखा।हम सेकेंड डिवीजन पास थे। हमने दुबारा अपना रोल नंबर चेक किया संतुष्ट होने पर अखबार ले घर की तरफ भागे। बाबूजी जंगल गये थे दादा शायद बाजार की तरह गये थे अतः हम अम्मा के पास गए तथा उनके चरण छूकर बताया कि हम सेकेंड डिवीजन पास हुए हैं, वो बहुत खुश हुई। हमें आशीर्वाद दिया फिर किसी को बाजार भेज कर मिठाई मंगवाई हमें खिलाई...

उरई

उधर भैया ने बीएसी ए जी पास कर ली थी और एलएलबी में एडमिशन ले लिया था, वह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बाबूजी के व्यापार में हाथ बटाते थे। अब रेल से लकड़ी, कोयला कम आता था ठेकेदारों ने ट्रक खरीद लीं थीं अतः ज्यादातर माल ( लकड़ी और कोयला) ट्रकों से आता था। इसकी खरीद फरोख्त ट्रकों का रख-रखाव का सारा काम भैया ही देखते थे।वो बाबूजी के सहायक के साथ-साथ सलाहकार भी बन गये थे।उसी समय भैया की शादी तय हो गई। सारा परिवार शादी की चर्चाओं और व्यवस्थाओं मैं व्यस्त हो गया।९ मार्च को भैया की शादी होगई। हम भी शादी में मस्त थे।  मानिकपुर में हमारे घर के पास एक संभ्रांत परिवार रहता है,वो चार भाई थे। बड़े भाई जमीदार थे तथा ठेकेदारी भी करते थे, दूसरे भाई शिक्षक थे जी आई सी उरई में, बाकी दो भाई पढ़ते थे। पड़ोसी होने के नाते हम भाई साहब कहते थे। बाबूजी ने उन्ही से मेरे पढाई की बात की होगी जो उरई में साइंस शिक्षक थे। खैर जुलाई माह में हमारा एडमिशन जी आई सी उरई में इन्टर फाइनल में हो गया और हमको वहां भेज दिया गया, हमें हास्टल में भी रूम मिल गया। उरई जालौन जिले का एक छोटा सा सुंदर और बड़ा प्रभावशाली नगर है। जिला तो ...