उरई

उधर भैया ने बीएसी ए जी पास कर ली थी और एलएलबी में एडमिशन ले लिया था, वह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बाबूजी के व्यापार में हाथ बटाते थे। अब रेल से लकड़ी, कोयला कम आता था ठेकेदारों ने ट्रक खरीद लीं थीं अतः ज्यादातर माल ( लकड़ी और कोयला) ट्रकों से आता था। इसकी खरीद फरोख्त ट्रकों का रख-रखाव का सारा काम भैया ही देखते थे।वो बाबूजी के सहायक के साथ-साथ सलाहकार भी बन गये थे।उसी समय भैया की शादी तय हो गई। सारा परिवार शादी की चर्चाओं और व्यवस्थाओं मैं व्यस्त हो गया।९ मार्च को भैया की शादी होगई। हम भी शादी में मस्त थे।  मानिकपुर में हमारे घर के पास एक संभ्रांत परिवार रहता है,वो चार भाई थे। बड़े भाई जमीदार थे तथा ठेकेदारी भी करते थे, दूसरे भाई शिक्षक थे जी आई सी उरई में, बाकी दो भाई पढ़ते थे। पड़ोसी होने के नाते हम भाई साहब कहते थे। बाबूजी ने उन्ही से मेरे पढाई की बात की होगी जो उरई में साइंस शिक्षक थे। खैर जुलाई माह में हमारा एडमिशन जी आई सी उरई में इन्टर फाइनल में हो गया और हमको वहां भेज दिया गया, हमें हास्टल में भी रूम मिल गया।

उरई जालौन जिले का एक छोटा सा सुंदर और बड़ा प्रभावशाली नगर है। जिला तो इसका जालौन है लेकिन शुरू से ही जिले के सारे जिला स्तरीय कार्यालय उरई में ही है। यह कानपुर और झांसी रेल तथा रोड़ रूट के मध्य में बसा है। यह बुंदेलखंड का एक प्रमुख नगर है यहां के लोग भी बुंदेलखंड के अन्य नागरिकों की तरह दबंग और स्पष्ट वादी हैं क्योंकि हम बांदा के रहने वाले थे अतः हमारी यहां पर लोगों से अच्छी पटने लगी तथा कुछ लोगों से अच्छी दोस्ती भी बहुत कम समय में होगयी।

यहां के हॉस्टल में एक आराम था कि यहां नए विद्यार्थियों का इंट्रोडक्शन के नाम पर कोई लफड़ा या झगड़ा नहीं था।  सब लोग हॉस्टल में प्यार से रहते थे यहां खाना भी ठीक मिलता था लेकिन एक समस्या थी कि यहां सुबह शाम चाय तो मिलती थी लेकिन कोई नाश्ता नहीं मिलता था उसकी व्यवस्था स्वयं को करनी पड़ती थी। यहां बाजार में  एक पूनम रेस्टोरेंट था जहां पर समोसे और मिठाइयां मिलती थी वहीं से रोज शाम हम समोसे खाते और दूसरे दिन नाश्ता के लिए बन या डबल रोटी, मक्खन ले आते।  यहां पढ़ाई भी ठीक चल रही थीं, भाई साहब के कारण साइंस और मैथ्स के टीचर हम पर विशेष ध्यान देते थे। मैथ्स के टीचर क्योंकि इलाहाबाद के थे इसलिए वो हमारा विशेष ध्यान रखते थे। हॉस्टल में मनोरंजन का कोई भी साधन नहीं था यहां ना कोई रेडीओ था और न किसी के पास ट्रांजिस्टर था, ले देकर एक अखबार आता था जो सुबह हॉस्टल वार्डन पढ़ने के बाद शाम को हॉस्टल में भेज देते थे, जिसमें कुछ देश दुनिया की खबरें हम लोग पढ़ लेते थे। एक छुट्टी के दिन वार्डन से परमिशन लेकर, अपने एक मित्र के साथ हम पिक्चर देखने गए।  एक तो कोई पिक्चर हाल अच्छा नहीं था हम टिकट ले ही रहे थे कि वहां पर कुछ स्थानीय लोगों में झगड़ा हो गया थोड़ी देर में वहां  आपस में लठ्ठ चलने लगे और हम वहां से हॉस्टल भाग आये और फिर कभी सिनेमा देखने नहीं गए ।

हॉस्टल के सामने कॉलेज की फुटबॉल फील्ड थी जिसमें कॉलेज के लड़के शाम को फुटबॉल खेलते थे पूर्व में यूपी कॉलेज में हम फुटबॉल खेलते थे अतः हम भी फुटबॉल खेलने एक दिन पहुंच गए, वहां पर स्पोर्ट टीचर थे उनसे हमने बताया कि हम पूर्व में फुटबॉल खेलते थे अतः हम भी फुटबॉल खेलना चाहते हैं । वो बहुत खुश हुए और पूछा किस पोजीशन पर खेलते थे, मैंने बताया कि मैं सेन्टर हाफ। उन्होंने सीटी बजा कर खेल को रोका और सारे खिलाड़ियों को दो टीमों में बांटा हमको एक टीम सेन्टर हाफ बना कर फिर खेल शुरू किया, करीब आधे घंटे बाद हमने एक गोल विरोधी टीम में मारा। हमारी टीम के खिलाड़ी बहुत खुश हुए। दुबारा मैच शुरू हो उससे पहले स्पोर्ट टीचर ने हमसे कहा फिर तुम सेंटर हाफ की जगह सेंटर फारवर्ड के स्थान पर खेलो और सेंटर फारवर्ड को हमारे स्थान पर भेज दिए। दोबारा मैच शुरू होने के बाद हमने फिर एक गोल कर दिया, खेल खत्म होने पर स्पोर्ट टीचर ने हमें बुलाया और कहा कि अब तुम सिर्फ सेंटर फारवर्ड के स्थान पर ही खेलना अच्छा खेलते हो इसको बनाए रखना। इस तरीके से हमारा फुटबॉल खेलना फिर शुरू हो गया हम रोज शाम को करीब 1 घंटे फुटबॉल खेलने लगे हमारा कॉलेज टीम में सिलेक्शन भी हो गया ।

उरई में प्रत्येक वर्ष जिला स्तर की एक फुटबॉल प्रतियोगिता होती थी। यह जिले की बहुत पुरानी परंपरा थी जिसमें जिले के समस्त कॉलेज, क्लब्स और जिले स्तर के कार्यालयों की टीमें भाग लेती थी। अतः हमारे कॉलेज में भी इस प्रतियोगिता के लिए खूब जोर से तैयारियां हो रही थी। अब फुटबॉल टीम को 1 घंटे के स्थान पर डेढ़ घंटे फुटबॉल रोज खेलना पड़ता था। अगस्त के पहले सप्ताह से फुटबॉल प्रतियोगिताएं शुरू हो गई। हमारे कॉलेज में कई में जीते फिर हमारा सेमीफाइनल मैच उरई पुलिस से कालपी होना तय हुआ। कालपी उरई जनपद का एक छोटा सा पवित्र नगर है। पवित्र इसलिए की यह  महर्षि वेदव्यास की जन्मस्थली है। उरई से कालपी करीब 20 से 25 किलोमीटर दूर जमुना किनारे बसा हुआ है। यहां रोड और रेल दोनों से आसानी से पहुंचा जा सकता है उरई से कानपुर जाने वाली रेल मार्ग पर यह दूसरा स्टेशन है,बीच में एक छोटा सा स्टेशन है आटा।

जिस दिन मैच था हमारे कॉलेज की पूरी फुटबॉल टीम और स्पोर्ट टीचर एक वरिष्ठ अध्यापक , कालपी जाने के लिए दिन में करीब 2:00 बजे उरई रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए। थोड़ी देर से झांसी कानपुर पैसेंजर से पूरी टीम  करीब 3:00 बजे हम लोग कालपी पहुंच गए।उस दिन ट्रेन काफी भीड़ थी क्योंकि उरई से काफी लोग मैच देखने कालपी आए थे। मैच शाम 4:00 बजे से होगा होना था अतः हम लोग फुटबॉल ग्राउंड स्टेशन से पैदल ही गए। टीम के सभी खिलाड़ियों अपने खेलने किट बदले और बूट इंक्लेट आदि बदले। ठीक 4:00 मैच शुरू हो गया। पुलिस टीम का मनोबल बढ़ाने के लिए कुछ पुलिस वाले तथा कुछ पुलिस के उच्च अधिकारी आए हुए थे लेकिन हमारा मनोबल बढ़ाने के लिए उरई के कई कॉलेजों के छात्र तथा फुटबॉल प्रेमी नागरिक खूब देर से आए हुए थे। उरई पुलिस की टीम में काफी उम्रदार खिलाड़ी थे खेल शुरू होने के थोड़ी देर बाद ही पता चल गया कि टीम में विशेष दम नहीं है। वो फुटबॉल कम रगबी ज्यादा खेल रहे थे। खेल शुरू होने के बाद करीब 20 मिनट बाद हमने एक गोल कर दिया। गोल के बाद जब दोबारा मैच शुरू हुआ तो उनके दो खिलाड़ी हमे ब्लाक करने लगे।बाल हमारे पास आए तो वह बाल को नहीं हमें मारने लगे।हाफ टाइम में हमारे स्पोर्ट्स टीचर ने हमें बुलाया और कहा किये तुम्हारे पीछे पड़ गए हैं इसलिए तुम सम्भल कर खेलो, आगे मत जाओ,बाल जब तुम्हारे पास आये तो लेफ्ट या राइट आउट को पास कर दिया करो। मैंने वैसा ही किया, थोड़ी देर बाद हमारे टीम के लेफ्ट इन हमारे पास पर एक गोल कर दिया। इस तरह हमारी टीम दो गोल से जीत गयी ।

मैच जीतने के बाद हमारी टीम रेलवे स्टेशन पर वापस आ गयी। स्टेशन पर ही हमने अपनी जर्सी और किट बदली।हमें पैरों में कई जगह चोट लगी थी उन पर हमने टिंचर आयोडीन लगा कर पट्टी बांध ली, जो हमारे बैग थी।हम पैजामा कुर्ता और चप्पल पहन कर एक बेंच पर बैठ कर रेलगाड़ी का इंतजार करने लगे। हमारे आसपास टीम के और भी खिलाड़ी थे। स्टेशन पर काफी भीड़ थी। ट्रेन आने पर बहुत मुश्किल से हम लोग एक बोगी में चढ़ पाए टीम के सभी खिलाड़ी और स्पोर्ट्स टीचर भी उसी बोगी में थे। ट्रेन थोड़ी देर में चली फिर थोड़ी चलने के बाद रुक गयी। बाहर काफी शोर हो रहा था,बाहर अन्धेरा होने के कारण कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। फिर ट्रेन चली और फिर अगले स्टेशन आटा पर रुकी। ट्रेन रुकते ही फिर शोर होने लगा प्लेटफार्म में रोशनी नहीं थी इसलिए कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। खैर कुछ देर बाद फिर ट्रेन चलीऔर उरई स्टेशन पर रुकी,हम सब लोग ट्रेन से उतर कर बाहर आए, प्लेटफार्म पर अब भी काफी हल्ला गुल्ला मचा हुआ था।हम सब के साथ स्टेशन से बाहर आए और हम रिक्शा कर के हास्टल चले आए। हास्टल पहुंच कर हमने स्नान किया और मेस में रखा ठंडा खाना खाया और कमरे में आकर सो गये। सुबह उठे तो हास्टल का एक छात्र एक अखबार लेकर मेरे पास आया और बोला कि कल रात तुम लोगों का स्टेशन पर कोई झगड़ा हुआ था क्या। मैंने कहा ऐसा तो कुछ नहीं हुआ था उसने कहा कि अखबार में छपा है कि फुटबॉल टीम के लोगों से रेलवे स्टाफ का झगड़ा हुआ और ट्रेन का गार्ड चाकू लगने से मर गया। मैंने उससे ले कर अखबार पढ़ा  वही छपा था।हम जल्दी से तैयार हो कर कालेज पहुंचे वहां पर भी हर तरफ़ उसी झगडे की चर्चा हो रही थी। हमारी फुटबॉल टीम के कई खिलाड़ी कालेज उस दिन आये ही नहीं थे। एक लडके मुझे से कहा कि यह चर्चा शहर में बहुत है,कि जिसने चाकू मारा है उसके हल्की-हल्की दाढ़ी है, पूरी टीम में केवल तुम्हारे दाढ़ी है अतः तुम अपनी दाढ़ी बनवा लो । मुझको लगा यह ठीक ही कहा रहा है अतः मैं अपनी दाढ़ी बनवाने नाई की दुकान चल दिया, रास्ते में मैंने यह महसूस किया कि मुझको लोग कुछ अजीब निगाहों से देख रहे हैं ।नाई  की दुकान पर भी मुझे बहुत अच्छा नहीं लगा, मेरे वहां पहुंच जाने से लोगों ने आपस में बात करना बंद कर दिया ।खैर मैंने अपनी दाढ़ी बनवायी,नाई को पैसे दिए और कालेज की तरह चल दिया । रास्ते में मुझे अजीब सा एहसास होने  होने लगी कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है। अतः पोस्ट आफिस जा कर मैंने बाबू जी को एक टेलीग्राम मानिकपुर में कर दिया (Come soon)और कालेज वापस आ गया

कालेज में पूरा दिन अफवाहों का बाजार गर्म रहा। क्लास भी ठीक से नहीं लगे। किसी तरह से दिन गुजरा ,शाम को हम हास्टल के मेस खाना खा कर अपने कमरे में आकर सो गये।रात करीब एक बजे किसी ने मेरे कमरे की कुड़ी खटखटाया मैंने जाग कर दरवाजा खोला और देखा कि हास्टल के वार्डन और कुछ पुलिस वाले थे।एक पुलिस अधिकारी ने पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है जैसे मैंने उसको अपना नाम बताया तो तुरन्त वह मेरा हाथ पकड़ कर मुझे  बाहर खड़ी अपनी जीप की तरह चल दिया और बाकी पुलिस वाले से कहा कि कमरे की तलाशी लो। हास्टल के बाहर चारों ओर बहुत पुलिस वाले थे। थोड़ी देर में कुछ पुलिस वाले आए और बोले कि तलाशी में कुछ नहीं मिला। फिर वो मुझे जीप में पीछे बैठा कर कोतवाली ले गए। कोतवाली में पहले से एक फोटोग्राफर मौजूद था पहले उन्होंने मेरी फोटो खिंचवाई फिर दो-तीन लोगो को बुला कर मुझे देखने कहा और उनसे बोले ठीक से पहचान लो इसे ताकि शिनाख्त करते समय कोई भूल-चूक न हो। उसके बाद फिर मुझसे पूझ ताछ चालू हुई।कौन हो कहां के रहने वाले हो,बाप का नाम क्या है वो क्या करते हैं।चाकू कहां है। मैंने कहा कि न मेरे पास चाकू है और न मैने किसी को मारा तब उसने मेरे बाल पकड़ कर मुझे दो तीन झापड़ मारा।उतने में उनमें एक बोला साहब इसको हाथ से न मारो, लाठी लेकर इसकी वो टांग तोड दो जिससे इसने गोल मारा था।

तब तक एक उच्च स्तरीय कोई पुलिस अधिकारी आ गया। उसने कहा छोड़ो इसे और मुझसे पूछा कि कहां के रहने वाले हो तो मैंने अपने गाँव और पिताजी का नाम बताया बताया । तो पिताजी का नाम सुनकर अचानक उनके मुंह से निकला अरे तुम उनके बेटे हो, यहां कर रहे हो। मैंने बताया कि जो G I C में टीचर हैं वो हमारे गांव में पड़ोसी हैं उन्ही के कारण यहां पढ़ने आए हैं। उन्होंने कोतवाल को अलग बुला कर कुछ कहा। उसके बाद हमसे पूझताछ बंद हो गई। दूसरे दिन करीब एक बजे हमें कचहरी में मजिस्ट्रेट सामने पेश करने को ले जाया गया। वहां बहुत ढेर से कई कालेजों के लड़के नारे लगा रहे थे और पुलिस वाले उन्हें रोक रहे थे। मजिस्ट्रेट के आफिस के सामने बाबू जी एक-दो लोगों के साथ खड़े थे। मेरे साथ जो पुलिस वाले थे उनसे मैंने बताया कि वो मेरे बाबूजी हैं मैं उनसे मिलना चाहता हूं वो कहते तब एक वकील साहब आ गये उन्होंने पुलिस वालों से कुछ कहा फिर वो चुप हो गए बस इतना कहा कि अपना चेहरा ढके रखना।तब तक बाबूजी आ गये उन्हें देख कर मै बहुत भावुक हो गया, बाबूजी बोले परेशान मत हो सब ठीक हो जाएगा। तुम्हारा तार पाते ही मै समझ गया था कि तुम परेशानी में हो इसलिए मैं जीप से सुबह आ गया था, अब सब ठीक है जल्दी तुम्हारी जमानत हो जायेगी। फिर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए। जमानत की बात हमारे वकील ने कहा तो मजिस्ट्रेट ने कहा कि ए नाम जद नहीं है इनकी शिनाख्त गवाहों से करानी जरूरी है अतः तब तक इन्हें जेल जाना होगा खैर जमानत तो हुई नहीं पुलिस वाले हमें जेल ले जाने के लिए जीप में बैठाकर जेल के दरवाजे तक ले गए। जेल के पास भी ढेर सारे कॉलेज के लड़के और नौजवान नारे लगा रहे थे और पुलिस वाला भी उनको रोकने की कोशिश कर रही थी। बाबूजी भी अपनी जीप से जेल के दरवाजे के पास पहुंच गए थे। उन्होंने मुझे एक साबुन ब्रश मंजन एक तौलिया तथा एक पजामा कुर्ता दिया, और बोले परेशान मत होना सब ठीक हो जाएगा। फिर हम जेल के अन्दर पहुंचा दिया गया।

जेल की अपनी दुनिया होती है,हर व्यक्ति को वहां जेल के नियमो के अनुसार चलना पड़ता है। हम भी उसी में शामिल हो गये। इस बीच बाबूजी तथा और ढेर से लोग मिलाई करने आते रहे। वहां हमारी शिनाख्त परेड हुई जहाँ गवाहों ने हमें नहीं पहचाना अतः हमारी जमानत हो गई और हम जेल से बाहर आ गए। बाहर बहुत-से रिश्तेदार और दोस्त मिले। फिर हम बाबूजी के साथ इलाहाबाद और मानिकपुर गये अम्मा तथा परिवार और दोस्तों से मिले । एक सप्ताह बाद हम फिर उरई लौट आए।फिर कचहरी और तारीखो में कुछ दिन हम, बाबूजी तथा वकील साहब लोग दौड़ते रहे। वहां तीसरा गवाह कभी आया ही नहीं औरदो अन्य गवाह ने शपथपत्र दिया कि हम केस के बारे में कुछ नहीं जानते ही नहीं पुलिस ने जबरन हमें गवाह बना दिया है। अतः वह केस वहीं खारिज और खत्म हो गया।

यह सब होते होते फरवरी का महीना हो गया।मार्च में एक्जाम आगये, पढ़ाई तो जैसी हुई होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। खैर हमने परीक्षा दी और पास भी हो गये। लेकिन उरई में बिताए करीब वर्ष ने हमें बहुत कुछ दिया। उरई के अच्छे लोग जो मेरे खराब और बुरे समय में, मेरे बाबूजी और मेरे साथ,न सिर्फ खडे रहे बल्कि जितना जिससे हो सका उसने उतनी मदद की।ध्यानू जैसे मित्र और मोना भाई साहब जैसे मेरे संरक्षक। उरई के अच्छे लोग आज भी मेरे हृदय में बसते हैं।


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