लौट के चन्दू घर को आये
एक वर्ष परेशानी, तनाव और संघर्ष में बड़ी मुश्किल से बीता। उरई में बीते एक साल ने मेरे आत्म विश्वास और मनोवैज्ञानिक सोच विचार तथा मेरे व्यवहार बहुत ख़राब असर डाला। बदनामी और ग़लत ख़बरें की गति बहुत तेज होती है। मेरे इलाहाबाद पहुंचने से पहले उरई कांड की खबर,आधे शहर में और मेरे जान-पहचाना के लोगों तक पहले पहुंच गयी थी।जो मिलता वह हाल-चाल पूछने से पहले पूछता चन्दूभाई का हुआ उरई वाले केस में,सब ठीक ठाक हो गया ना। हमारे लायक कौनो काम हो तो बताओ।हमारा नाम वैसे भी `बहुत भले लोगो' था, एक और तगमा लग गया। खैर हम इन्टरमीडिएट मैथ्स और साइंस से पास हो गये और इलाहाबाद पहुंचे कर हमारा एडमिशन C M P डिग्री कालेज में B S c फर्स्ट इयर करा दिया गया। हमारे मित्र कुंवर भी वहां मिल गये वो हमारे क्लास में ही थे।
बड़े भैया की शादी हो जाने के कारण यह महसूस किया गया कि जिस घर में हमारा परिवार किराये पर रहता है,वह छोटा है तथा लड़कियों के कालेज से दूर है। इसलिए बाबूजी ने एक बड़ा मकान जो दो मंजिला था जिसमें सब के लिए पर्याप्त स्थान था तथा कई कमरे थे, किराए पर लिया, जिसका हाउस नंबर १०० था। यह मकान आगे चलकर हमारे लिए बहुत शुभ और भाग्यशाली साबित हुआ।जब तक वहां रहे ,सुख और आनंद से रहे। बाबूजी के व्यापार में भी खूब तरक्की हुई और परिवार के यश में बृद्धि हुई। व्यापार बढ़ जाने तथा भैया की शादी हो जाने के कारण, भैया पूर्ण कालिक व्यवसाय में बाबूजी का हाथ बंटाने लगे। प्रतिदिन सुबह मानिकपुर के जंगलों से दो तीन ट्रक लकड़ी आती,उसे आढ़त में भेज कर, लकड़ी बेचकर उसका हिसाब किताब रखते तथा ट्रको की सर्विस और मेनटेनस का काम भी वो देखते, फिर दोपहर तक उन ट्रकों को मानिकपुर भेज देते,ताकि दूसरे दिन फिर ट्रक लकड़ी ले कर सुबह तक आ जायें।
लेकिन हमारी पढ़ाई का वही पुराना ढर्रा था। इलाहाबाद आ जाने से फिर वही पुराने दोस्त और अड्डेबाजी शुरू हो गई। उरई मेडेल मिल जाने के कारण हमारी रंगबाजी भी कुछ ज्यादा बढ़ गई तथा हमारा ग्रुप भी बड़ा होने लगा।बांदा, फतेहपुर और हमीरपुर के तमाम छात्र हमारे पास आने लगे तथा उनकी छोटी मोटी समस्यों निवारण भी हम करने लगे । हमारे पास ज्यादातर यूनिवर्सिटी,ई सी सी तथा सी एम् पी डिग्री कालेज के हास्टल और ग्रामीण क्षेत्रों के पढ़ने वाले लडके आने लगे।हम सब जरूरत पड़ने पर एक दूसरे की मदद भी करने लगे।हम धीरे धीरे उनके लीडर बन गए। हमारे एक दोस्त सरदार जी भी थे जो ई सी सी में हमारे साथ पढ़ते थे।उनके पिता जी की चौक में कपड़े की बड़ी सी दुकान थी जहां से हमारे सभी बहन भाइयों के कपड़े अम्मा खरीदती थी।वह सरदार दोस्त कालेज में क्लास के बाद अपने पिता जी की दुकान में भी बैठता था।उसी दुकान से उस लड़की के घर के कपड़े भी खरीदे जाते थे, जिसके पीछे ई सी सी में झगड़ा हुआ था और हम तथा वो लड़की दोनों कालेज से निकाले गए थे। उसने हमें एक चिट्ठी भी लिखी थी जो बाबूजी के हाथ पड़ गई थी। तथा हमको जिसका दंड भी भोगना पडा था। उसके बारे में हम सिर्फ इतना जानते थे कि वह बी एच यू में पढ़ती है। लेकिन वह शायद मेरे बारे सरदार जी के माध्यम से खबर रखती थी।उसे उरई की घटना, मेरे पुनः इलाहाबाद लौट आने तथा नये घर के बारे में जानकारी सरदार जी से मिल गई थी। अतः एक दिन वह बनारस से इलाहाबाद शायद दसहरे की छुट्टी में घर आई तो राम बाग रेलवे स्टेशन पर उतरी जो मोहल्ले के एकदम बगल है। उसने अपने घर जाने के लिए रिक्शा किया और जब मोहल्ले से निकली तो उनके रिक्शे वाले को १०० नंबर मकान किसी पूछ कर ले चलो। उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी क्यों कि १०० नंबर तब तक काफी फेमस हो गया था हमारे सत गुणों के कारण सुबह सुबह का टाइम था, बड़े भैया लुंगी और बनियान पहने अपने ट्रक ड्राइवरों से बाहर खड़े बात कर रहे थे कि गाडियां किस आढ़त में जायेगीं। उतने वो लड़की आकर सीधे भैया से पूछा १०० नंबर यही है। भैया ने कहा कि है तो यही, तुम्हें किससे मिलना है। उसने कहा कि मुझे चन्दू से मिलना है उसे बुला दो। भैया ने कहा तुम कौन हो और चन्दू से क्यों मिलना चाहती हो। उसने कहा कि वह मेरा दोस्त है और मैं बाहर से आई हूं इसलिए उससे मिलना है। आवाजें कुछ ऊंची हो रही थी तब तक हम बाहर आ गए। हमने बताया कि ये हमारी दोस्त है। भैया ये सब अच्छा नहीं लगा और वो गुस्से में घर के अन्दर चले गए। उसने पूछा कैसे हो,सुना है किसी मुश्किल फंस गए थे। मैंने कहा ठीक हूं,सी एम् पी डिग्री कालेज में पढता हूं वही आना वही मिलना अभी तुम जाओ । वो तो चली गई लेकिन घर में भैया ने अम्मा से कहा यह वही पंडिताइन है जिसके लिए ये कालेज से निकाला गया था। आज ये होलडाल और सूटकेस लेकर यहां रहने आई थी इसके साथ।
मैंने बहुत कहा कि वो बी एच यू में पढ़ती है, दशहरा में अपने घर आईं होगी उसने उरई कांड के बारे कहीं से सुना होगा इसलिए मिलने चली आई। लेकिन हमारी सुनता कौन जब दोष लगाने वाले बड़े हों। हमें एक मेडेल और मिल गया, घर परिवार तथा समाज में मिर्च मसाला लगाकर हमारे बारे में चर्चा खूब होने लगी। हमारे समाज में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है " नारी चरित्रम पुरुषस्य भाज्ञम दैवो न जानस्य कुतो मनुष्यम" । सोचिये जिसकी एक चिट्ठी आजाने से हमारी कस कर पिटाई हुई थी वह स्वयं हमारे घर पर प्रगट हो गई थी ।अब हम अपने भाग्य तथा भविष्य की कल्पना कर सकते थे।हम उस दिन की कल्पना करके सिहर उठते जब यह समाचार बाबूजी को पता चलेगा। हमने अपने कुछ खास दोस्त रज्जू और कुवंर से सलाह ली कि ऐसी स्थिति में क्या करें, कैसे बाबूजी का सामना करे। कोई विशेष लाभ नहीं हुआ उन दोनों ने कहा कि अब तुम्हारी पिटाई तो होगी ही ऐसे में क्या किया जा सकता है। अचानक दो दिन बाद बाबूजी तथा मझले दादा हमारे कालेज जाने के बाद, मानिकपुर से जीप से आये वो दोनों काफी परेशान थे। अम्मा को ये बात कर कि कौहन में कुछ झगड़ा हो गया है जिसमें बडे दादा यानी बाबूजी के बड़े भाई फंस गए हैं। तुरंत गांव चले गए।
जब हम कालेज से वापस लौटे तो हमें तब हमें पता चला कि बाबूजी तथा मझले दादा आये और तुरंत गाँव चले गए, वहां कुछ झगड़ा हो गया है ।पहला विचार हमें आया बच गए, लगता है भाग्य कुछ ठीक ठाक है।तीन दिन बाद बाबूजी बड़े दादा के साथ आये और मझले दादा को गाँव में ही छोड़ आये थे।आते ही वो सिविल लाइंस में किसी बड़े वकील के यहां चले गए फिर काफी देर बाद शाम को आये । फिर दूसरे दिन फतेहपुर चले गए,शायद वहां से कुछ पेपर लाने थे।इधर बाबूजी बहुत व्यस्त तथा परेशान थे। क्यों कि गांव में काफी बड़ा झगड़ा हो गया था। बड़े दादा के चेलों से तथा उनके विरोधी पार्टी से लट्ठ चल गई थी। विरोधी पार्टी ने बड़े दादा का नाम भी F I R में लिखा दिया था कि वो दूर खड़े हो कर लट्ठ चलाने वाले को ललकार रहे थे और मारो इन्हें। अतः वो भी मुकदमें में फंस गए थे ।बाबू जी फतेहपुर पुलिस, कचहरी और वकीलों के चक्कर में बहुत परेशान और व्यस्त थे। पिछले साल हमारे केस में परेशान थे अब कौहन के झगडे में परेशान थे। लेकिन उरई के केस के कारण उन्हें पुलिस, कचहरी तथा वकीलों से कब और कैसे डील करना है,उसका उन्हें अच्छा अनुभव हो गया था।
करीब दो हफ्ते की भाग दौड़ और व्यस्तता के बाद बाबूजी की बातों से ऐसा लगने लगा कि स्थिति कन्ट्रोल में है।अतः वो दो चार दिन इलाहाबाद में आराम करने के लिए रुक गये।बस सही वख्त देख कर कुछ लोगों ने हमारी शिकायत कर दी। बाबू जी ने गुस्से में हमें बुलाया और पूछा कि ये क्या मै सुन रहा हूं कि वो लड़की अपना सामान लेकर यहां रहने आई थी। मैंने बताया कि वह बी एच यू में पढ़ती है दशहरे की छुट्टी में अपने घर आई थी। किसी ने उसे उरई कांड के बारे बता दिया था। अतः वो संवेदना व्यक्त करने और मेरा हाल चाल जानने आई थी। इस पर बाबूजी ने पूछा कि अगर वो तुम्हारा हाल चाल जानने आई थी तो होलडाल और सूट केस ले कर क्यों आईं थीं। मैंने बताया कि वह बनारस से अपने घर दशहरे की लंबी छुट्टी पर आई थी, इसलिए हास्टल से अपना सारा सामान लेकर आई थी और वह राम बाग रेलवे स्टेशन पर उतरी थी इसलिए लिए अपने घर जाने से पहले वह मुझसे मिलने आ गयी थी क्योंकि हमारा घर स्टेशन के बहुत निकट है। बाबूजी ने फिर पूछा वह कितने दिन बाद तुम से मिलने आई थी।मैने कहा दो साल ज्यादा हो गया आखिरी बार ई सी सी में मिला था जब झगड़ा हुआ था। फिर बाबूजी बोले अब उससे न मिलना क्यों कि उसके लिए इस घर में कोई जगह नहीं है। और हम बिना मार पीट के इतने बड़े मुकदमें से बच गए।
घर परिवार की समस्या से हट कर, आइये हमारी पढ़ाई लिखाई या कहिए कालेज लाइफ़ के बारे में चर्चा करें।हुआ कुछ यूं कि उस दिन जो लड़की हमसे मिलने घर पर आईं थीं और हमारे बड़े भैया उलझ गये थे, उसको हमने यह कहकर उसके घर भेज दिया था कि सी एम् पी डिग्री कालेज में मिलने आना। वो दूसरे दिन कालेज में आ गयी हम कैंटीन में अपना अड्डा लगाये बैठे थे उसको वहां देखा पहले हम चकित हुए और फिर अपने गणो से कहा कि तुम लोग जाओ वो चले गए तो हमने उसे कैंटीन में अपनी टेबल पर बैठा लिया। हमने चाय मंगाई फिर वह हमारे बारे पूछती रही कैसे हो, उरई में क्या हुआ था।हम अच्छे बच्चे जैसे उसको सब बताते रहे , वो जो भी पूछ रही थी।सच्चाई ये थी कि हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी इससे पहले हमने किसी लड़की से इतनी नजदीकी से बात नहीं की थी। फिर कुछ देर बाद वह अपने बारे में बताती रही हम सिर्फ सुनते रहे कुछ देर बाद वो बोली अब मैं चलती हूं। हमने कहा ठीक है और उसे उसके रिक्शे तक छोड़ने चले गए जो उसके साथ आया था और इंतजार कर रहा था। उसके जाने के बाद हमने यह महसूस किया कि बहुत ढेर सारे लोग हमें घूर रहे थे,कई जगह कुछ खुसुर पुसुर हो रही थी। थोड़ी देर बाद कुंवर क्लास करके आए तो उसने बताया कि यह लड़कों का कालेज है, ई सी सी जैसा को-एड नहीं है इसलिए लड़की देख कर सब भौंचक्के है। खैर कुछ देर बाद सब ठीक हो गया लेकिन दूसरे दिन कैंटीन के नोटिस बोर्ड पर एक नोटिस लगी थी। कैंटीन में लड़कियों का आना मना है।खैर हम पर कोई असर नहीं पड़ा इस नोटिस का क्योंकि उसके बाद वो कभी नहीं आई। हम अड्डा लगाने के साथ साथ अपने क्लासेज भी अटेंडेंट करते रहते थे। लेकिन हम क्लास में सब से पीछे बैठते थे ताकि ज्यादा पूछताछ न हो। इसलिए हम टीचर और स्टाफ के बीच में पापुलर नहीं थे बल्कि वो हमें पसंद नहीं करते थे।
पढाई लिखाई,घर कालेज के बीच में समय कब और कितना बीत गया पता ही नहीं लगा। दिसंबर के मध्य में कुंवर ने बताया कि उनके पूज्य बाबा जी का स्वर्गवास हो गया है अतः वो कुछ दिनो के लिए गांव जा रहे हैं । कुंवर फिर नव वर्ष में लौटे, उनके बाल घुटे हुए थे उन्होंने एक फर की टोपी लगा रखी थी । कुवंर के दुख में शामिल होने के लिये हमने भी अपने सर का मुंडन करा लियाऔर एक फर की टोपी खरीद कर पहन लिये। हम दोनों कालेज में करीब-करीब एक जैसे कपड़े पहन कर जाते थे और दोनों एक जैसी फर की टोपी लगाते थे। बहुत से लोग हमें समझते थे कि ये भाई-भाई है। एक दिन हम दोनों केंटीन में बैठे थे और भी कई लोग बैठे थे।अचानक केमिस्ट्री डिपार्टमेन्ट के एक अध्यापक केंटीन में आ गए और वहां पर बैठे छात्रों से पूछने लगे कि कौन हो यहां क्यों बैठे हो उन लोगो बताया कि वो छात्र है तो बोले कि अपने अपने क्लास में जाओ उन छात्रों ने कहा कि इस समय कोई क्लास नहीं है। उसके बाद वो हमारी तरफ आया और बोला तुम दोनों कौन हो, ऐसे बैठे हो जैसे कहीं के राजा महाराजा हो। हमने कहा कि "हैं तो हम राजा महाराजा लेकिन यहां छात्र भी है" ।वह बोला कंहा के राजा हो, हमने कहा कि जब जरूरत होगी बता देंगे। अचानक उसकी नज़र हमारी चारमीनार सिगरेट की डिब्बी पर पड़ी तो बोला तुम लोग सिगरेट पीते हो यहां सिगरेट पीना मना है।मैने कहा कि "छात्रों की कन्टीन में बिकती क्यों है और किसके लिए? अगर कोई ऐसा नियम हो कि कालेज कैम्पस में सिर्फ टीचर सिगरेट पी सकते हैं छात्र कैंटीन में भी नहीं पी सकते ,तो कृपया दिखाइये और छात्र कैंटीन में सिगरेट बिकवाना कल से बंद करवा दीजिए"। उसको जब कुछ जवाब नहीं सूझा तो बोला कि तुम लोग राजा महाराजा हो तुम्हें सिगरेट नहीं हुक्का पीना चाहिए और चला गया। हमारे समझ ये नहीं आया कि वह छात्र कैन्टीन में आया क्यूं था कुंवर ने कहा कि घर से लड़कर आया होगा खैर लडके खुश थे कि सही जवाब दिया। हमको लगा कि ये हमको लड़को के सामने हमें अपमानित करने आया था। लड़कों ने बताया कि यह ऐसे ही सनकी है। यह ऐसे ही क्लास में लड़कों के पीछे पड़ जाता,आप से सही जवाब पा गया है अब कुछ दिन ठीक रहेगा। हमने कुंवर से सलाह कि इसको इसकी क्लास में चिढ़ाया जाय सो हम माघ मेला से दो माले सफेद बड़े बड़े मोतियों के खरीद लाये। हमारे एक मित्र के यहां फर्सी वाला हुक्का था वो मांग लाए और ई सी सी होस्टल से एक गण को पैजामा कुर्ता में आने का इन्तजाम कर लिया। हमारे पास एक बंद गले का सूट था और कुंवर के पास बंद गले का नेवी ब्लूकोट था। जिस दिन उस टीचर की क्लास थी उस दिन हम और कुंवर दोनों बन्द गले के कोट और सूट पहन कर आये साथ ही दोनों फर की टोपी भी लगाए थे।
कैन्टीन में बैठे कर हमने मोतियों के माले पहने और ई सी सी से आये अपने गण को हुक्का पकड़ाया और हुक्के की फर्सी पकड़ कर चल दिए केमेस्ट्री की क्लास करने। क्लास लग चुकी थी हम, कुंवर और वह हुक्का बरदार क्लास के गेट पर पहुंचे और हमने पूछा "माबदौलत अन्दर आ सकते हैं"। उसने पूछा कौन हो तुम लोग तो हमने कुंवर को देख कर कहा "महाराज ठेंगागढ़ और हिज हाइनेस खुरदुरा"।उस दिन तुमने पूछा था न कैन्टीन में कि कहां राजा महाराजा हो सो हम अपना परिचय दे रहे हैं। इतना सुनना था कि पुरी क्लास हंसने लगी और वो टीचर गुस्से में क्लास छोड कर चले गए। थोड़ी देर में क्लास के लड़के भी चले गए तो हमने ई सी सी वाले लडके से कहा कि अब तुम भी हुक्का लेकर अपने हास्टल जाओ शाम को मिलेंगे वह भी चला गया।हम और कुंवर लौट कर कैन्टीन में आ गये। वहां तरह-तरह की चर्चा हो रही थी।एक चर्चा यह भी थीं कि वह टीचर प्रिंसिपल का दामाद है और वह हम लोगों को कोई न कोई सजा आवश्य दिलवायेगा। खैर जो होना था वह हो गया अब आगे जो होगा देखेंगे।दो दिन बाद कालेज नोटिस बोर्ड में यह नोटिस लगा दिया गया कि अनुशासन हीनता के कारण हम और कुंवर एक माह के लिए केमिस्ट्री क्लासेज से निष्कासित किए जाते हैं।बाकी क्लासेज मैथ और फिजिक्स के हम अटेन्ड करते रहे।
इधर होम फ्रंट पर भी काफी कुछ हो रहा था। बाबू जी कौहन के झगडे के सिलसिले में अक्सर फतेहपुर जाते थे तथा तारीखों पर यहां इलाहाबाद से एक बहुत प्रसिद्ध वकील को केस कोर्ट में पेश करने के लिए ले जाते थे फतेहपुर में हमारी बिरादरी या यूं कहिए हमारे गोत्र के एक विधायक थे ठाकुर जगन्नाथ सिंह जो हमारे दूर के रिश्तेदार भी थे। उन्होंने कौहन वाले केस में बाबूजी की बहुत मदद की थी । उनकी लड़की की शादी फरवरी के अंतिम सप्ताह में थी बाबूजी उस शादी में फतेहपुर गये थे वहां शादी में उत्तर प्रदेश के गृह मंत्री ठाकुर हरगोविंद सिंह भी आये हुए थे वहां बाबूजी की मुलाकात गृहमंत्री से जगन्नाथ सिंह जी ने कराई। बातों बातों में गृहमंत्री महोदय ने कहा जगन्नाथ सिंह से कि आपने अपने बिटिया की शादी तो करली हमको भी कोई लड़का बताइए हमारी पोती के लिए वह लखनऊ में लाल बाग में पढ़ती है । उन्होंने बाबूजी जी से मिलवाते हुये बताया कि ये जंगल के बड़े ठेकेदार हैं, इनके तीन लड़के हैं बड़े लड़के की शादी हो चुकी है, दूसरा बेटा बी एस सी कर रहा है इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से। तीसरा अभी छोटा है। फिर उन तीनों बुजुर्गो में कुछ बातें हुई और यह तय हुआ कि वो जल्द ही मानिकपुर आयेंगे शादी तय करने के लिए। फतेहपुर से लौट कर बाबूजी सीधे इलाहाबाद आए रात काफी देर से। होली नजदीक आ गयी थी इसलिए हम उस दिन काफी भांग खा लिये थे और घर जल्दी आगे थे। बाबू जी ने आकर अम्मा को हमारी शादी की चर्चा के बारे में बताया।हम बगल के कमरे में लेटे हुए थे कुछ-कुछ बातें हमने भी सुनी हमारा सारा नशा दूर हो गया। बाबू जी जब सोने चले गए तो हमने अम्मा को धीरे से बुला कर पूछा कि बाबूजी क्या बात कर रहे थे मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा है
अम्मा ने कहा कि सो जाओ बहुत रात हो गई है मैंने जिद किया कि अभी बताओ कि बाबूजी क्या बात कर रहे थे।वह बोली तुम कैसे बोल रहे हो, तुम्हारी आवाज़ क्यों लड़खड़ा रही है। तुम्हारी आंखें भी लाल है कोई नशा किया है क्या? मैंने बताया कि मैने भांग खाई है जिसका नशा है वो एक चम्मच में सरसों का तेल गरम कर के लाई और गुनगुना तेल हमारे दोनों कानों आधा-आधा डाल दिया। थोड़ी देर बाद हमारा नशा उतर गया फिर उन्होंने बताया कि जगन्नाथ सिंह की बिटिया की शादी में एक मंत्री जी आये थे उनकी पोती से तुम्हारी शादी की बात जगन्नाथ सिंह ने चलाई है। मैंने कहा कि मुझे शादी-वादी नहीं करनी है। मैं करता क्या हूं जो मेरी शादी की बात की जा रही है। अम्मा बोलीं कल सुबह अपने बाबूजी से बात कर लेना अभी सो जाओ। मैंने कहा कि आपको पता है कि मैं बाबूजी से बात नहीं कर पाता इसलिए आपको बता दिया मैं शादी-वादी नहीं करूंगा। और सोने चला गया।
दूसरे दिन हम थोड़ी देर से उठे, बाबूजी जग चुके थे , अम्मा ने शायद हमारी उनसे रात में हुई बात बाबूजी को बता दिया था। थोड़ी देर में बाबूजी ने हमें बुलाया हम उनके पास जाकर जैसे पैर छूकर खड़े हुए, वो बोले अब तुम्हारी तबियत कैसी है। मैंने कहा मुझे क्या हुआ है मै बिल्कुल ठीक हूं। वो बोले तुम ठीक नहीं हो अब नशा भी करने लगे हो। जैसे तुमने कल रात, मेरी तुम्हारी मां से हुई बात तुमने सुन ली थी वैसे ही मैंने भी तुम मां बेटे की सारी बातें सुन ली है। वैसे भी तुम्हारी पढ़ाई लिखाई में कोई सिर पैर नहीं है अब नशा भी करने लगे हो। मैंने कहा कि मैं नशेड़ी नहीं हूं, होली नज़दीक आ गयी है अतः कल एक दोस्त के यहां गया था जो पंडा है उसके यहां मिठाई खाई थी उसमें भांग थी इसलिए नशा आगया था। बाबूजी बोले अब नशा-वशा मत करना। कुछ देर चुप रहे, फिर बोले तुमने रात में कुछ बातें सुन ली है अब मैं पूरी बात बात देता हूं। जगन्नाथ सिंह की बिटिया की शादी में ठाकुर हरगोविंद सिंह जो वर्तमान में गृहमंत्री है आए थे। वो अपनी पोती की शादी के लिए लड़का खोज रहे हैं, जगन्नाथ सिंह ने उनको हमसे मिला दिया कि हमारा दूसरा लड़का बी एस सी कर रहा है । इस तरह से शादी की बात चली। हमको भी लग रहा है यह शादी ठीक है और समयानुसार है उसके तीन कारण है।पहला शादी के बाद तुम्हारा उस लड़की संबंध छूट जायेगा जो तुमसे मिलने तुम्हारे कालेज तक पहुंच जाती है और तुम उसे अपनी कैन्टीन में चाय पिलाते हो और करीब एक घंटे बात करते हो, ये मत भूलो कि कालेज में तुम अकेले नहीं पढ़ते हो हमारे कई मिलने वालों के लड़के वहां पढ़ते हैं हमें यह भी मालूम है कि तुम्हे और कुंवर को केमेस्ट्री क्लासेज से एक महीने के लिए निकाल दिया गया है। अब हमें काटो तो खून नहीं।हम ये क्यों भुल गए थे कि ये हमारे बाप हैं। इसके बाद वो जो बोल रहे थे वह सब हमारी खोपड़ी के ऊपर से जा रहा था। बाबूजी बोले इस शादी का दूसरा कारण यह है कि इस शादी और सम्बन्ध से मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा बहुत बढ़ जायेगी जो तुम्हारे कारण ज़मीं पर है। और तीसरा कारण ये है कि इस संबंध से कौहन वाले केस में बहुत फर्क पड़ेगा। इसलिए ये शादी मै तय करने जा रहा हूं।अब तुम्हे कुछ कहना तो कहो।कहने को बचा ही क्या था जो मै कहता बस इतना कह पाया कि बाबूजी मैं कुछ करता नहीं हूं मेरी कोई इनकम नहीं है आगे बीबी बच्चे होंगे तो उनका खर्चा मैं कैसे उठाऊगा। वो बोले तुम अपने खर्चे की चिंता करना तुम्हारे बीबी बच्चों का खर्च जब तक मै जिंदा हूं मै उठाऊंगा, जो उन्होंने जीवन भर निभाया।
इसके बाद बाबूजी ने नाश्ता किया और अपनी जीप से मानिकपुर चले गए । थोड़ी देर बाद हम भी अपनी साइकिल से कालेज चल दिए ,पता नहीं क्यों यह लग रहा था कि साइकिल किसी चीज से लड़ा दे।खैर कालेज पहुंच कर कैन्टीन में बैठ गए।थोड़ी देर में कुंवर आ गए और आते ही बोले आज जल्दी आय गयो घर से निकार दियो गये का।हम बोले अबहीं तो नहीं पर जल्दी निकारे जाब। फिर हमने जो घटा था सब बताया।वह भी हमारी बात सुनकर स्तब्ध रह गया , थोड़ी देर बाद बोला बडी मुश्किल समस्या है अब क्या किया जाए। हमने कहा कि पहले ये पता लगाया जाय कि इस कालेज में कौन ऐसा है जो हमारी सब खबर बाबूजी तक पहुचाता है । कुंवर बोले उससे क्या होगा,उसे मारोगे , एक शिकायत और होगी और अबकी कालेज से निकाल दिये जाओगे। इसलिए शांत रहो शाम को रज्जू के यहां सब मिलकर इस समस्या पर विचार करते हैं
शाम को हम, कुंवर,शरद,बापी आदि रज्जू के यहां इकट्ठे हुए ,। भीड़ हो जाने के कारण यह तय हुआ कि कम्पनी गार्डन चला जाय वहीं वार्ता होगी। अतः सब कम्पनी गार्डन पहुंच गए, वहां लान के एक शांत कोने में हम लोग इक्कठे बैठ गये या यूं कहिए कि अड्डा लगा लिया। फिर हमने अपनी समस्या बताई।बाकी चीजों से वो पहले से वाकिफ थे उनके लिए वो कोई समस्या नहीं थी। लेकिन हमारी शादी की बात सुनकर सब स्तब्ध हो गये।ऐसी समस्या का सामना किसी ने नहीं था। तरह तरह के सुझाव आए। कहीं भाग जाव साल छय महीने के लिए फिर जब लौट के आवो तो थोड़ी पिटाई होगी सह लेना। लड़की के घर वालों चिट्ठी लिख दी जाय कि लड़के का चरित्र ठीक नहीं है गुन्डा है। अबे इतना सब झेले हौ शादी भी कर के झेल जाव।अगर एकर शादी होइगयी तो अड्ढे में एक कम हो जाएगा। इस तरह के कई सुझाव आ रहे थे तब रज्जू बोले तुम लोग किच-किच करो हम थोड़ी देर आते हैं। थोड़ी देर वो लौटे तो उनके हाथ में दोने में ढेर सी मिठाई और भांग की गोलियां थी फिर सब ने भांग खाई और मिठाई खाईं जब थोड़ी देर बाद नशा चढ़ गया तो पंचो ने फाइनल सुझाव दिया।अबे चन्दू तू शादी करले,तेरी इज्जत बढ़ जायेगी घर में भी और बाहर भी कि तू अब शादीशुदा है, भला आदमी है और हमें भी एक भौजाई मिल जायेंगी। बाबू जी भी खुश हो जायेंगे कि तुमने उनकी बात मानी और अम्मा को एक और बहू मिल जाएगी। इस फैसले के साथ अड्डा विसर्जित हुआ, सब लोग अपने अपने घर को निकल लिए गये।
कुछ दिन बाद बाबूजी ने खबर भिजवाई कि गृहमंत्री जी नवरात्रि के शुरू होने के दूसरे दिन मानिकपुर आरहे है, शादी की वार्ता करने। इसलिए हम सब इलाहाबाद वाले घर में ताला लगाकर मानिकपुर पहुंच गए। गृहमंत्री जी निश्चित तिथि को अपने एक मित्र जो यू पी के एडवोकेट जनरल थे तथा अपने एक भतीजे जो कानपुर मेडिकल कॉलेज में सहायक प्रोफेसर थे , के साथ समय पर पहुंच गए। उनके साथ जिले के कई अधिकारी भी आए थे।उनका बहुत स्वागत किया गया है। दोपहर के भोजन के बाद परिवार के वरिष्ठ लोगों के साथ गृहमंत्री जी की बहुत देर वार्ता होती रही फिर हमें बुलाया गया और गृहमंत्री जी ने कहा कि हम तुम्हारी शादी के लिए आयें है तुम्हें कुछ कहना है।हमने कहा कि मैं अभी बी एस सी कर रहा हूं, भविष्य में क्या होगा, पता नही क्या अभी शादी उचित है? वो बोले ये जो बगल में बैठे हैं मेरे मित्र हैं।जब ये कक्षा नौ में पढते थे तब इनकी शादी हुई थी आज प्रदेश के एडवोकेट जनरल है,मै जब हाई स्कूल में था मेरी शादी हुई थी मैं प्रदेश में मंत्री हूं और ये मेरे दूसरी बगल में बैठे हैं ये मेरे भतीजे है,जब ये इंटर में पढ़ते थे।तब इनकी शादी हुई थी आज डाक्टर है। तुम तो बी एस सी कर रहे हो।अब क्या कह सकते थे बस सब के पैर छूकर हाल से बाहर चले गए।
लो जी इस तरह से हमारी शादी तय हो गई और तय हुआ कि अगले महीने कौहन में तिलक और चार जून को जौनपुर में शादी। कौहन में तिलक इसलिए रखा गया कि इस बहाने असोथर से कौहन तक की सड़क बन जायेगी और जिला पुलिस पर प्रभाव पड़ेगा जिससे मुकदमें में फर्क पड़ेगा। निश्चित तिथि को हम लोग कौहन पहुंच गए।अच्छी खासी सडक बन गई थी। दूसरे दिन गृहमंत्री आये उनके साथ दो तीन उनके परिवारिक लोग थे। जिला प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी थे जो हर काम सहायता तथा मदद कर रहे थे।शाम होने से पहले हमारा तिलक हुआ फिर नाश्ता करने के बाद मंत्री जी लौट गए।हम लोग भी दूसरे दिन इलाहाबाद वापस आ गए। घर में शादी की तैयारियां होने लगी। ये काम सब बाबूजी और अम्मा तथा घर के अन्य बड़ों का था। हमारे लिए कुछ कपड़े तथा सूट बनवा दिया गया तथा बता दिया गया कि बारात में तुम्हारे पांच छय दोस्त जा सकते हैं।
इधर ये सब कुछ चल रहा था।हम बहुत दिनों से कालेज नहीं गए थे।जब हम कई दिनों बाद कालेज पहुंचे तो एक शुभ समाचार मिला कि अटेंडेंस कम हो जाने के कारण हम और कुंवर एक्जाम में नहीं बैठ सकते।हमने कुंवर से पूछा कि अब क्या किया जाए वो बोला कि कुछ भी नहीं किया जा सकता है। तुम्हारे न रहने पर मैंने सब कोशिश कर ली। नोटिस बोर्ड से उसी दिन नोटिस ग़ायब करवा दी थी। इसलिए शायद ही इस बारे किसी को पता हो। बस तुम चुप रहना। सबसे कहेंगे कि हम एक्जाम दे रहे हैं यह कर कुंवर ने हमें एक्जाम की इस्कीम दी। उसने समझाया हम एक्जाम के दिन घर से ठीक टाइम पर निकल कर यूनिवर्सिटी के एक्जाम हाल के पास मिला करेंगे फिर एक्जाम खत्म होने पर लड़कों से पेपर लेकर सब से बतायेंगे कि पेपर बहुत कठिन था या आउट आफ कोर्स आया था।हम दोनों ने यही नौटंकी किया। हकीकत यह थी कि हम ने बी एस सी फर्स्ट इयर का एक्जाम ही नहीं दिया था।
इधर इलाहाबाद से मानिकपुर तक शादी की तैयारियां बड़ी जोरो से चल रही थी। चढ़ाव के गहने और कपड़े, बरात में जाने वालों की लिस्ट और उनको नेवता भेजना, इलाहाबाद और मानिकपुर के घरों की लिपाई और पुताई आदि चल रही थी, कि गृहमंत्री जी का पत्र बाबूजी के नाम आई उन्होंने सूचित किया था कि देश प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का स्वर्गवास हो गया है अतः शादी में गाना बजाना, लाउडस्पीकर, आतिशबाजी और बैंड बाजा आदि नहीं होना चाहिए। शादी एकदम सादे तरीके से हागी। अब शादी तो होनी ही थी सो चार जून को बारात जौनपुर पहुंच गई और सादे तरीके से हमारी शादी होगई।५ मई को बारात जौनपुर में रुकी।६ मई को विदाई हुई और बारात शाम तक मानिकपुर वापस पहुंच गई। अब हम शादीशुदा और `इज्जतदार' इंसान हो गए थे।७ मई को हम और हमारे छोटे भाई संग्राम दोनों जीप लेकर जंगल चले गए। दोपहर बाम्बे मेल से वही पंडिताइन लड़की हमारे सरदार दोस्त के साथ मानिकपुर आ पहुंची, पता नहीं कि हमारे घर वालों ने उससे कैसे डील किया। वो दोनों शाम की बाम्बे मेल से वापस इलाहाबाद चले गए।जब हम देर शाम को जंगल से वापस आए तो घर में आग लगी हुई थी, तरह तरह की चर्चा से माहौल गर्म था। हमारी पत्नी से भी हमारी कुछ चचेरी बहनों ने मिर्च मसाला लगाकर न मालूम क्या-क्या जड दिया था।खैर जो भी हमारी थोड़ी बहुत इज्ज़त थी उस का फलूदा निकल गया।पूरे परिवार और समाज में तमाम तरह की चर्चा हो रही थी।सब नाराज थे ऐसे में हमारी पत्नी ने हमारा साथ दिया। उसने हमसे कुछ नहीं कहा और न ही वह नाराज़ हुई, न गुस्सा हुईं। हमने ही उसे सब साफ साफ बताया तो उसने कहा कि उसे मुझ पर विश्वास है।
कुछ दिन बाद हम इलाहाबाद चले आए। हमारी शादी को करीब एक महीने हो रहे थे।हमारे समाज और बुन्देलखण्ड की एक रीत या कहिए कि परम्परा है कि शादी के हफ्ते दस दिन के बाद दूल्हन के माइके से भाई या और कोई आकर उसे विदा करा ले जाता है। इस लिए बाबूजी ने गृहमंत्री जी को पत्र लिखा कि बहू को आकर कुछ दिन के लिए विदा करा ले जाइए। फिर थोडे दिन बाद हम आपनी विदा करा ले जायेंगे। अतः कुछ दिन बाद गृहमंत्री जी हमारी पत्नी को विदा कराने स्वयं आये और बाबूजी को बोले कि हमारे तरह ऐसी कोई परम्परा नहीं है। हमारे यहां तो शादी के बाद लड़की को तभी बुलाते जब घर या परिवार में कोई कार्य हो। बाबूजी बोले अब की आप विदा करा ले जाइए फिर जब कोई कार्य आपके परिवार में होगा तो बहू को हम स्वयं भेज दिया करेंगे।विदा के एक हफ्ते बाद बाबूजी स्वयं जा कर अपनी बहु विदा करा लाए।
जैसा हम पहले बता चुके हैं कि अटेंडेंस कम हो जाने के कारण हम बी एस सी पार्ट वन का एक्जाम नहीं दे पाए थे। अतः पास फेल होने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। जब विदाई का झांम ताम हो रहा था।तब हमने ई सी सी में बी ए में अपना एडमिशन करालिया और इतिहास, दर्शनशास्त्र, और हिन्दी विषय लिए। चूंकि बाबूजी से हमारा आमना सामना और बातचीत बहुत कम होती थी, अतः हमने अम्मा को बता दिया कि साइंस साइड में हम नहीं चल पा रहे थे । इसलिए हमने आर्ट साइड में एडमिशन करा लिया है। हमने अम्मा से यह भी कहा कि जैसे हमारी छोटी बहनें पढ़ने जाती हैं वैसे ही हमारी पत्नी को भी पढ़ने भेजा जाय। बाबूजी के आने पर अम्मा ने बाबूजी को हमारी सब बातें बता दिया, वो बोले उससे तो मुझे कोई उम्मीद नहीं है। जो उसके मन में आए करे, एक भले घर की लड़की व्याह कर इस घर में ले आया हूं, उसी की चिंता मुझे है। इस लिए उसे ही मै पढ़ाने की सोच रहा हूं ताकि वो ही अपने लिए कुछ कर सके। इसलिए हमारी पत्नी का भी आर्य कन्या इन्टर कालेज में एडमिशन करा दिया गया।
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