चन्दू

 मई माह समाप्त हो गया। जून का महीना आते ही दिल की धड़कन बढ गई कि हाई स्कूल का रिजल्ट जाने कब आ जायेगा। रोज रेलवे स्टेशन जाते और ए यच व्हीलर की किताब की दुकान पर पता लगाते की हाई स्कूल का रिजल्ट कब आएगा। उससे निवेदन करते कि रिज़ल्ट के दिन एक एक्स्ट्रा कापी हमारे लिए मंगा ले । आज का जमाना तो था नहीं,न कम्प्यूटर, न इन्टर नेट, बस अखबार में रिजल्ट छपता था और उस दिन अखबार की कीमत बीस गुना बढ़ जाती थी। यू पी में तब केवल एक ही बोर्ड होता था और पूरे प्रदेश में करीब अस्सी हजार छात्र हाई स्कूल एक्जाम देते थे । खैर इन्तजार ख़त्म हुआ,एक दिन हाई स्कूल का रिजल्ट आ ही गया। ए एच व्यीलर की दुकान पर बहुत भीड़ थी फिर भी थोड़ी कोशिश के बाद हमको अखबार की एक कापी मिल गयी। हमने अपना रोल नंबर देखा।हम सेकेंड डिवीजन पास थे। हमने दुबारा अपना रोल नंबर चेक किया संतुष्ट होने पर अखबार ले घर की तरफ भागे। बाबूजी जंगल गये थे दादा शायद बाजार की तरह गये थे अतः हम अम्मा के पास गए तथा उनके चरण छूकर बताया कि हम सेकेंड डिवीजन पास हुए हैं, वो बहुत खुश हुई। हमें आशीर्वाद दिया फिर किसी को बाजार भेज कर मिठाई मंगवाई हमें खिलाई तथा सब को बांटी। हमने घर में सभी बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लिया।शाम को बाबूजी आए वो हमारा रिज़ल्ट सुन बहुत खुश हुए।बात खुशी की थी,उस जमाने में फर्स्ट डिवीजन ज़िले,में एक या दो लड़कों के आते थे, सेकेंड डिवीजन में कुछ पास होते, थर्ड डिवीजन में लंम्बी लाइन होती थी।

रिज़ल्ट आने के बाद, घर में इस बात की चर्चा होने लगी कि हमारा एडमिशन कहां कराया जाय। बाबूजी और बड़े भैया इस पक्ष में थे की हमारा एडमिशन इविंग क्रिश्चियन कॉलेज  इलाहाबाद में कराया जाय। हम चाहते थे की हम यू पी कालेज में ही पढें क्यों कि हम वहां दो साल पढ़ चुके थे हमारा सब समझा बूझा था और हमारा इलाहाबाद का पूर्व मौलवी अनुभव अच्छा नहीं था। लेकिन प्रजातंत्र में बुहमत की जीत होती है, यह तय हुआ कि हम इलाहाबाद के E C C में पढेंगे।इसी बीच हमारी मार्कशीट भी डाक से आगयी, हमारे मैथ में डिस्टिंक्शन आया था बस क्या था यह भी निर्णय हो गया की हम इन्जीनियर बनेगे।हम डाक्टर बनना चाहते थे लेकिन मैथ के डिस्टिंक्शन सब गड़बड़ कर दिया। हम कुछ कहते तो कोई मानता नहीं इसलिए चुप रहे।

बड़े भैया जो पिछले छह साल से इलाहाबाद में पढ़ रहे थे, वर्तमान में बी एस सी ( ए जी) एग्रीकल्चर इंस्टिट्यूट से कर रहे थे, हमें ई सी सी इलाहाबाद लिवा गये। वहां उन्होंने हमारे लिये एडमिशन फार्म लिया और हमसे बोले तुम यह फार्म भरो तबतक मै हास्टल का फार्म लेकर आता हूं । हमने फार्म भरा लेकिन मैथ के स्थान पर बायो भर दिया और अपने मार्कशीट की अटेस्टड कापी नत्थी कर के जमा कर दिया, भैया हास्टल का फार्म लेकर आये और मुझे पूछा फार्म का क्या किया,मैने कहा जमाकर दिया और इतने रुपए फीस जमा करनी है। उन्होंने हास्टल का फार्म भरवाया तथा दोनों की फीस इकट्ठी जमा करा कर, रसीदें लेकर, बोले "चलो चले,तुम्हारा एडमिशन हो जायेगा बस यह पता लगाना होगा की हास्टल कौन सा मिला सो मै पता लूंगा"। हम मानिकपुर लौट आए।एक हफ्ते बाद भैया ने बताया कि हास्टल मिल गया है और हमारा सामान बंध गया बस दूसरे दिन ई सी सी इलाहाबाद के हास्टल में पंहुच गये।रूम में सामान रखा कर भैया हमें कैफेटेरिया में लिवा गये और उन्हेंने हमारे लिए करीब पचास रुपए के कूपन खरीद दिये। फिर हमें बताया कि कैसे कूपन दे कर खाना खरीदा जाता है।हम दोनों भाइयों ने कैफेटेरिया में खाना खाया,असल में वो सिखा रहे थे कि कैफे में कैसे आचरण करना है फिर वो हमको हास्टल में छोड़ कर, अपने कालेज चले गये और कह गए कि परेशान न होना मैं कल आऊंगा।दिन तो ठीक-ठाक बीत गया,शाम को हमने कैफे में पूछा कि घी मिलता है कि नहीं वो बोले घी तो नहीं मिलता मक्खन मिलता है आप घी बाहर से लाकर खा सकते हो।

शाम का खाना खा कर हम हास्टल आये तो हमें एक रूममेट इन्तजार करते मिला, उसने बताया कि उसे यह रूम एलाट हुआ था। हमने उसका स्वागत किया और ताला खोल कर कमरे में उसका समान रखने में मदद की फिर हमने उससे कहा कि चलो तुम्हें कैफे से खाना खिला लाऊं वो बोला खाना उसके पास है, अम्मा ने पूरी सब्जी बांध दिया था वहीं खालूगा। उसने खाना खाया फिर हम लोग सोने की तैयारी कर रहे थे कि तब ही किसी दरवाजा नाक किया, मैने पूछा कौन है तो वह बोला सीनियर ने तुम दोनों को तुरंत हाल में बुलाया है।मै तो समझ गया कि क्या बात है मेरा पार्टनर थोडा घबराया। मैंने उसे बताया कि घबराने कोई बात नहीं है, इंट्रोडक्शन के लिए बुलाया होगा  नाम, पता, घर-द्वार तक पूंछेगे तो बता देंगे अगर बत्तमीजी करें तो देखेंगे। मैं दो साल हास्टल में रह कर आ रहा हूं,बस दबना नहीं।हम हाल में पहुंचे वहां तीन सीनियर कुर्सियां पर बैठकर दो लड़कों को कुछ हड़का से रहे थे, हमको देख कर कहा "आवो-आवो हीरो कहां-कहां के हो?" मैंने कहा बांदा जिला पार्टनर ने कहा बलिया, फ़िर उसने पूछा बांदा में कहां से मैंने कहा मानिकपुर से पार्टनर से पूछा तो उसने कहा बलिया खास। फिर पूछा हाईस्कूल कहां से किया है मैंने बताया यू पी कालेज वाराणसी से पार्टनर ने कहा जी आई सी प्रतापगढ़ फिर उनमें एक बोला तुम लोगों के बाप क्या करते हैं। मैंने जरा ऊची आवाज कहा कि बाप-दादा पर मत जाओ, जरा तमीज से बात करो, इस पर बात बढ़ने से पहले जो सीनियर पहले पूंछ पाछ कर रहा था उसने बीच बाच किया हम-लोगों को अपने कमरे में जाने को बोला सो हम चारों अपने अपने कमरों में चले गए। मेरा पार्टनर थोडा परेशान था कि अगले दिन क्या होगा, मैंने कहा कुछ नहीं होगा जो होना होता तो अभी हो जाता। 

हम सो गए, सुबह उठे क्लास के लिए तैयार हो कर हास्टल से बाहर निकले तो देखा कुछ सीनियर इकट्ठे हो हो कर आपस कुछ बात कर रहे थे। इतने में हमारे बड़े भैया रिक्शे से अपने एक दोस्त के साथ आ गये। मैंने उनके चरण छूकर प्रणाम किया तब तक एक सीनियर जो रात में पूछ ताछ कर रहा था वह भी आकर भैय्या के पैर छू कर प्रणाम किया और भैय्या से खुद ही कहने लगा कि कल रात भैय्या गड़बड़ होते होते बचा "पुन्नी भैया को मय पहिचानय नहीं पायों इनसे एक सीनियर पूछ लहिस तुम्हारे बाप क्या करते हैं तो पुन्नी भैया लड पडे। हालांकि जब ई बताइन कि मैं मानिकपुर का हूं तब मैं जान गया था कि ई पुन्नी भैया है, तब तक पूछ बैठा और तू तू मै मै होगयी"। भैय्या गुस्से में बोले "मै बताऊं का कि मोर बाप कारत है?" तो वह हाथ जोड़कर बोला भैया मै रात में ही सब बता दिया था वह बहुत डरा हुआ है आप कहो तो अभी सब के सामने आपसे और पुन्नी भैया से माफी मांगले। भैय्या ने कहा बुलाव उसे वह आया और भैय्या से पैर छू कर माफी मांगने लगा।तब तक एक पुलिस की जीप आकर रुकी उसमें से उतरे हमारे रूम पार्टनर और उनके पिता जी जो पुलिस में एक उच्च अधिकारी थे,आते पूछा कौन पूछ रहा था कि तुम्हारे बाप क्या करते हैं वह सीनियर सीधे उनके चरणों में गिर रोने लगा।खैर उन्होंने उसे माफ़ कर दिया। फिर हमने पार्टनर के पिता चरण छूकर प्रणाम किया भैय्या ने भी प्रणाम किया वो बहुत खुश हुए फिर वो चले गये। इस के बाद हमारे हास्टल में इंट्रोडक्शन ही बंद हो गया। असल में वह सीनियर मानिकपुर के पास का रहने वाला था और मानिकपुर में ही पढा था इसलिए हमारे परिवार भर को जानता था। उसने हॉस्टल के लड़कों से नामालूम क्या बताया था कि सब मुझसे दूर दूर रहते थे कौई मेरा रास्ता नहीं काटता था।

इस कॉलेज में एक अजीब सा विभाजन था इंग्लिश स्कूल के लड़के जो इंग्लिश मीडियम से हाई स्कूल पास करके आए थे उनका ग्रुप अलग था तथा जो हिंदी मीडियम से पढ़ कर आए थे इनमें से ज्यादातर हॉस्टल में रहते थे और कुछ शहर में कमरा लेकर रहते थे, उनका एक अलग ग्रुप था अंग्रेजी स्कूल के बच्चे हिंदी मीडियम वालों को `देसी या देहाती' कहते थे, उनकी तरफ कुछ हेय दृष्टि से देखते थे तथा उन पर वक्त बेवक्त कमेंट करते रहते थे। क्योंकि हिंदी मीडियम वाले लड़के ज्यादातर गांव से संबंधित थे अतः हाथ पैर से मजबूत होते थे,इसलिए कभी कभार इंग्लिश मीडियम वालों से उन पर कमेंट पास करने पर, मारपीट कर लेते थे। कभी-कभी हम पर भी कमेंट होते थे क्योंकि हम कैफेटेरिया में अपना घी का अलमुनियम का डिब्बा टांग कर खाना खाने जाते थे जिससे कॉन्वेंट से पढ़ कर आए लड़कों की नजर में हम देसी और गवार थे। अतः कभी-कभार हमारे पीछे से "देसी है देहाती है ,गवार है" ऐसे कमेंट पास होते थे। जब पलट कर देखो की कमेंट कहां से आया तो कोई दिखाई नहीं देता था,सामने से कोई कमेंट नहीं करता था इसलिए हमको भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। 

कॉलेज में दो-तीन दिन की छुट्टी थी अतः जो  बच्चे जो नजदीक के थे अपने घर चले गए थे। हॉस्टल में जो लड़का दूध देने आता था, उसका दूध बच गया था अतः वह वह दूध लेकर वापस जा रहा था अचानक उसने मुझे देखा, क्योंकि मैं भी उसे रोज सुबह शाम आधा-आधा सेर दूध लेता था, तो पूछा कि "भैयाजी दूध बच गया है लेंगे क्या?", मैंने पूछा की कितना दूध बच गया है, दूध वाला बोला करीब एक सेर मैंने कहा ला मुझे दे दो अभी पी लेता हूं । उसने मुझे दूध का डिब्बा दिया और मैंने डिब्बे में मुंह लगाकर उसका सारा दूध पी लिया। फिर मैंने उससे कहा कि इस दूध के पैसे मेरे हिसाब में लिख लेना। यह दृश्य नजदीकी खड़े दो सज्जनों को अच्छा नहीं लगा वह दोनों एक ही साइकिल पर बैठे हुए एक सीट पर बैठे थे और दूसरे साइकिल के डंडे पर, एक से कहा "अरे-अरे देखो यह एक सेर दूध कच्चा ही पी गया" दूसरा बोला "देहाती है ना ठीक से खाना पीना ना मिलता होगा"। मुझे गुस्सा आया और मैंने जाकर उनको साइकिल से धकेल कर गिरा दिया। चूंकि हॉस्टल के सामने का मामला था तो हॉस्टल के कुछ लड़के बाहर निकल आए मेरी तरफ आकर खड़े हो गए, इस पर उनमें से एक सज्जन बोले तुम हमें नहीं जानते हो हम तुमसे निपट लेंगे मैं भी कहा "हां-हां निपट लेना", फिर वह दोनों गुस्से में वहां से चले गए और 2 दिन बाद बड़े भैया को साथ लेकर आए। भैया ने बताया कि "यह शरद है और यह जासवा ये दोनों जमुना स्कूल में मेरे साथ पढ़ते थे और मेरे बहुत अच्छे जान पहचान के हैं, इसे झगड़ा नहीं दोस्ती कर लो"। हमारी उन से सुलह हो गई तथा धीरे-धीरे दोस्ती हो गई जो अब तक कायम है जसवा तो रहे नहीं शरद आज भी वैसे हैं जैसे साठ साल पहले थे और मेरे अच्छे मित्रों में है । यही से दोस्ती की  चेन शुरू हो गई रज्जू, कुंवर प्रभाश,विभाष,सुरेश,गुरू बेबी, राम कुमार आदि आदि।

2 महीने बाद भैया को यह पता लग गया की मैंने मैथ्स ग्रुप नहीं बल्कि बायो ग्रुप ज्वाइन किया है और जूलॉजी बॉटनी पढ़ता हूं मैथमेटिक्स नहीं, उन्होंने यह बात बाबूजी को बता दी एक दिन हमको हॉस्टल में ही बाबूजी की डांट फटकार मिली और हमें बायो ग्रुप छोड़कर मैथ्स ग्रुप ज्वाइन करना पड़ा बस उसी दिन से हमारी पढ़ाई वाली खिड़की बंद हो गई जिसके हाई स्कूल में मैथ्स में डिस्टिंक्शन आए हो उसे फिर जिंदगी भर यह समझ में नहीं आया की साइन स्क्वायर थीटा प्लस को स्क्वायर थीटा इक्वल टू वन क्यों होता हैं। मैं डॉक्टर बनना चाहता था लेकिन इस घटना की वजह से यह समझ में आ गया कि मैं डॉक्टर नहीं बन सकता। मैं कुछ दिन बहुत दुखी था चौराहे से किराए की साइकिल लेकर इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज के सामने खड़े होकर घंटो  एप्रन पहने लड़के लड़कियों को  देखता रहता और फिर उदास होकर हॉस्टल वापस आ जाता। चूंकि पढ़ाई की खिड़की बंद हो गई थी तो एक दूसरी खिड़की खुल गई, आवारगी की। पढ़ाई से मन उचट सा गया था। 2 महीने बाद मैथ्स की क्लास जॉइन करने में कुछ समझ में नहीं आरहा था। टीचर से पूछ नहीं सकते थे हॉस्टल के कुछ लड़कों से थोड़ा बहुत पूछ कर शुरुआत की लेकिन ट्रिगोनोमेट्री, कैलकुलस आदि समझ से बाहर हो रही थी। इसलिए पढ़ाई से मन उचटने लगा और सिनेमा देखने जाने लगे। उसे समय सिनेमा देखना गलत बात नहीं बल्कि अपराध की श्रेणी में आता था। कभी-कभी सिनेमा देखने के कारण शाम को लेट हो जाते थे तो कैफेटेरिया में खाना नहीं मिलता था इसलिए कालेज के बाहर सिन्धी होटल में खाना खाने जाते थे। वहां कुछ हमारे जैसे दुःखी आत्मा और सिनमचिडी मिल गए फिर उनके साथ अड्डा लगने लगा।

उसे समय एक पिक्चर अगर किसी हाल में लग जाती तो वह महीना चलती थी, आजकल जैसा नहीं की पिक्चर एक हफ्ते में ही हाल से  उतर जाए। इसलिए लोग एक-एक पिक्चर कई कई बार देखते  थे। उस समय कुछ अच्छी पिक्चर लगी थी जैसे मुगल-ए-आजम, चौदहवीं का चांद, कोहिनूर आदि। मैंने चौदहवीं का चांद कई बार देखी थी। इसलिए कालेज में मुझे लोग चंद्रभाल की जगह  चंन्दा कहने लगे फिर चंन्दा से चन्दू होगया। धीरे-धीरे हमारा चार पांच लड़कों का गुट बन गया।कुछ लड़के कालेज के बाहर से आते थे जो स्टूडेंट नहीं थे वो आकर इंग्लिश मीडियम से आये छात्रों से उनकी पाकेट मनी छीन लेते और कालेज की लड़कियों से छेड़छाड़ करते ।कुछ के अभिभावकों ने कालेज में शिकायत भी की लेकिन उन्हें उत्तर मिला कि बाहरी लड़कों का वो कुछ नहीं कर सकते।अब किसी को तो कुछ करना था तो हमारे स्वभाव और संस्कार,कि किसी बदमाश या अत्याचारी को निर्विरोध न जाने दिया जाय , ने जोर मारा। दो-तीन चौराहा युद्ध हुये और समस्या का समाधान काफी हदतक हो गया। लेकिन इससे दो चीजें और हुई हम चन्दू से चन्दू भैया होगये और हमारा गुट गुट से गैंग हो गया, जो अच्छा नहीं था।

ऐसे ही हमारी पढ़ाई कॉलेज और हमारी जिंदगी चलती रही।अप्रैल का महीना आ गया और कॉलेज में इंटर फर्स्ट ईयर के लड़कों का एग्जाम चालू हो गया, महीने के अंत तक सारे रिटन एग्जाम हो गए बस  फिजिक्स और केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल एग्जाम बाकी रह गए थे। वह भी मई महीने के पहले सप्ताह में होने थे और उसके बाद गर्मी की छुट्टी हो जानी थी। कॉलेज इंटर फर्स्ट  ईयर के लड़कों का रिजल्ट  पोस्ट के द्वारा उनके घर भेजता था । हमारा केमिस्ट्री का प्रैक्टिकल हो गया था और  दूसरे दिन सुबह की पारी में हमारा फिजिक्स का प्रैक्टिकल होने के बाद  हमको दूसरे दिन मानिकपुर गर्मी की छुट्टी में जाना था। उसी दिन दोपहर के बाद लड़कियों का फिजिक्स का प्रैक्टिकल एग्जाम था हम अपने दोस्तों के साथ हॉस्टल में बैठे थे तभी फिजिक्स लैब का एक चपरासी भाग-भाग आया और बोला की कुछ लोग फिजिक्स लैब में लड़कियों को छेड़ रहे हैं तुरंत आप लोग पहुंचे ।हम चार-पांच लड़के हॉस्टल से भाग कर फिजिक्स लैब पहुंचे वहां पर लैब असिस्टेंट था और मेरे क्लास  की एक लड़की बुरी तरह डरी हुई खड़ी थी उसके कपड़े भी फटे थे मैंने उससे पूछा क्या हुआ तो उसने एक अध्यापक का नाम लिया और बोली वह तो भाग गया लेकिन यह लैब असिस्टेंट भी उसकी मदद कर रहा था हमने उस लैब असिस्टेंट की पिटाई की फिर एक रिक्शा बुलाकर उस लड़की को उसके घर भिजवा दिया। फिर हम हास्टल लौट आए। दो दिन बाद हम मानिकपुर चले आए।

एक हफ्ते बाद हमारा रिजल्ट बाई पोस्ट आया लेकिन उसके साथ एक बम भी आया। इंटर फर्स्ट  ईयर पास तो हम हो गए लेकिन इस रिजल्ट के साथ कॉलेज का एक नोटिस भी था जिसमें लिखा था अनुशासनहीनता के कारण हमको कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया है। फिर क्या था घर में सब बड़े मुझे बहुत नाराज हुए और बाबूजी ने मेरी अच्छी खासी डांट लगाई। घर का माहौल बहुत गर्म था इसी बीच एक बम आकर और फटा। हुआ ये कि दो  दिन बाद उसे लड़की का एक पत्र आया मेरे नाम जो मेरे मझले दादा के हाथ में पड़ गया उन्होंने उसे बांचने के बाद बाबूजी को यह कहते हुए थमा दिया कि "देख ले एहिके लच्छन ठीक नहिआंय कौउनौ बिटीवा एही चिट्ठी लिखिस है"।मै यह कभी नहीं जानने पाया कि उस पत्र में क्या लिखा था। बस ये जानता हूं कि उस समय घर में चार जोड़ी जूते मुझसे बड़े थे और मेरा समर वेकेशन विंटर वेकेशन में बदल गया।

आजकल जब टेलीविजन एंकरों को यह कहते सकता हूं की इतने लोग वहां पर थे और उस लड़की पर जुल्म होता रहा ,उसको कोई कातिल चाकू मारता रहा किसी ने उसे बचाने की कोशिश क्यों नहीं की। तो सोचता हूं कि किसी अबला को बचाने में मुझे क्या मिला - कॉलेज से निष्कासन, घर में बड़ों से पिटाई और समाज में बदनामी कि जरूर इसका उसे लड़की से कोई चक्कर रहा होगा नहीं तो यह बचाने क्यों जाता। पता नहीं मैं उस समय सही था या गलत लेकिन झेल गया।

इस घटना के बाद बाबूजी ने एक बडा निर्णय लिया। इलाहाबाद में जमुना क्रिश्चियन स्कूल के पास एक तीन कमरे का मकान किराए पर लिया और अम्मा का ट्रांसफर मानिकपुर से इलाहाबाद कर दिया गया। अम्मा के साथ हमारी छोटी दो बहने ,एक छोटा भाई और एक बड़े दादा का लड़का भी पढ़ने आ गए।छोटे भाइयों का एडमिशन जमुना क्रिश्चियन हाईस्कूल में करा दिया गया तथा बहनों का एडमिशन आर्य कन्या इंटर कालेज में करा दिया गया। अब बचे हम जिनके कारण वह रचना रची गई थी ,सो हमारा एडमिशन अग्रवाल डिग्री कालेज में इन्टर सेकेंड इयर में करा दिया गया।एक दिन हम ई  सी  सी गये अपनी टी सी  लाने तो पता चला कि हम अकेले ही नहीं निकाले गए कालेज से, वह लड़की,वह टीचर और लैब असिस्टेंट सब निकाल दिये गये। देखिए उच्च न्याय का उदाहरण भुक्तभोगी, अपराधी गवाह, मददगार सब लोग दंडित किए गए - न कोई जांच हुई न जिरह न बहस न सफाई बस सीधे सजा। खैर जो होना था हुआ। वहीं यह पता चला कि उस लड़की का एडमिशन बी एच यू में हो गया है। कालेज के लड़के लड़कियों मेरे उस कृत्य ख़ुश थे ।

हम अग्रवाल डिग्री कालेज में पढ़ने जाने लगे लेकिन पढ़ाई में मन नहीं लगता था,कुछ पुराने दोस्त और दुश्मन भी मिल गए कुछ झगड़े कुछ समझौते हुए बस यूंही समय बीतने लगा कालेज और घर के बीच।

एक दिन बाबूजी जी आये हुए थे इसलिए हम जल्दी घर आ गए थे।शाम को जल्दी से खाना खा कर हम अपने कमरे में चले गए।शाम से ही हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, रात में बारिश तेज हो गई।सब लोग जल्दी से खाना खा कर अपने-अपने कमरों में चले गए।हम रात करीब ग्यारह बजे उठे बाहर का दरवाजा खोला एक छाता लिया,पैन्ट के दोनों पायचें घुटने तक मोड़ लिया और हवाई चप्पल पहन कर बाहर निकल कर शरद के घर गया।शरद की खिड़की पर धीरे से नॉक किया, शरद ने पूछा कौन, मैने कहा "मैं हूं अपनी साइकिल लेकर बाहर आओ" फिर हम दोनों कटघर चौराहे पर गये वहां एक चाय वाले को जगाया और तीन चाय बनाने को कहा  और शरद से कहा कि कुंवर को बुला लावो । थोड़ी देर में कुंवर आ गए,हम तीनों ने चाय पी और इधर उधर की बातें करते रहे,एक दूसरे का मज़ाक़ उड़ाते रहे फिर शरद कुंवर को छोड़न चला गया,शरद के आने पर मैं शरद को उसके घर पर छोड़ कर अपने घर आ गया,  घर पहुंच कर मैंने बाहर का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। थोड़ी देर बाद किसी ने दरवाजा खटखटाया मैंने पूछा "कौन?" तो बाबूजी की गुस्से भरी आवाज सुनाई दी"अबे दरवाजा खोल"। मैंने दरवाजा खोला, बाबूजी जी छाता लिया,पूरे भीगे हुए मेरी तरफ गुस्से से देखते हुए सीधे अम्मा कमरे में गये और अम्मा से बोले "ये तीनो पागल है" फिर उन्होंने अम्मा को पुरा किस्सा बताया कि जब मैं घर से बाहर निकला तो उनको लगा कि मैं किसी ग़लत काम के लिए रात में घर से बाहर जा रहा हूं तो वो मेरा दो घंटे तक पीछा करते रहे।जब मै गया था तो बाहर का दरवाजा खोला कर गया था,जब मैं लौटा तो मैंने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और बाबूजी बाहर रह गए। बाबूजी को मेरी दो घंटे जासूसी करके कुछ नहीं मिला अतः डांट नहीं मिली बस इतना ही कहा कि रात बिरात इस आवारागर्दी ठीक नहीं है।

हमारा पढ़ाई लिखाई  मे बिल्कुल मन नहीं लग रहा था।बस कालेज जाते और लौट आते। 

उधर भैया ने बीएसी ए जी पास कर ली थी और एलएलबी में एडमिशन ले लिया था, वह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बाबूजी के व्यापार में हाथ बटाते थे। अब रेल से लकड़ी, कोयला कम आता था ठेकेदारों ने ट्रक खरीद लीं थीं अतः ज्यादा तर माल ( लकड़ी और कोयला) ट्रकों से आता था। इसकी खरीद फरोख्त ट्रकों का रख रखाव का सारा काम भैया ही देखते थे।वो बाबूजी के सहायक के साथ साथ सलाह कार भी बन गये थे।उसी समय भैया की शादी तै होगई।सारा परिवार शादी की चर्चाओं और व्यवस्थाओं मैं व्यस्त हो गया।९ मार्च को भैया की शादी होगई। हम भी शादी में मस्त थे 

आखिर अंत में यही हुआ हमने इन्टर फाइनल का एग्जाम दिया ही नहीं। इससे बाबूजी और नाराज हो गए यहां तक की हमसे बोलना भी छोड़ दिए उनको हमसे अगर कुछ कहना होता तो अम्मा के माध्यम से ही कहते।मै किसी भी तरह मैथ्स पढ़ने को तैयार नहीं था,यह बात बाबूजी को पता लग गई थी। अचानक उन्होंने हमें एक दिन बुलाया और बोले कि अगर मेरे कहने से , तुम्हें ऐसा कुछ करना पड़े जिससे तुम्हें एक साल की जेल काटनी पड़े तो क्या तुम मेरे लिए वह करोगे।मैने कहा हां बाबूजी। तो वो बोले मै तुम्हारा एडमिशन जी आई  सी उरई में करा रहा हूं। वहां जाकर इन्टर फाइनल करो।असल में बाबूजी के मन में दो बातें थीं,एक कि उरई जाने से मेरे दोस्त यार छूट जायेगें और उरई में एक ही सिनेमा हाल है। इसलिए मेरी सिनेमा देखने की आदत छूट जायेगी।


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