चन्दू चले हंस की चाल (सुधरने का प्रयास)

अरे अभी तक हमने अपनी पत्नी का नाम तक नहीं बताया। हमारी पत्नी का नामऊषा है। शादी के बाद धीरे-धीरे हमें ऊषा के परिवार के बारे में पता चला। पिता जी रेलवे के बड़े अफसर थे जो गोरखपुर में पोस्टेड थे,उनके नव बच्चे थे ६ लडके और ३ लड़कियां। अचानक वर्ष १९६० में जब उनके सबसे छोटे लड़के की उम्र सिर्फ छय दिन की थी,हार्टअटैक में उनका स्वर्गवास हो गया।पूरा परिवार बिखर गया।इनकी अम्मा गोरखपुर से अपने गांव आ गई अपने तीन लड़कों के साथ तथा  बाकी  भाई बहन तीन चाचा में बट गये।सब से बडे लडके को अनुकम्पा के आधार पर रेलवे ने  नौकरी देदी जिनकी तुरंत शादी कर दी गई। ऊषा और उनके एक भाई लखनऊ में बाबा जी के साथ रहकर पढ़ाई करते थे। बाबा जी डाईबेटिक थे अतः वो चाहते थे कि लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाय। इसलिए हमरी शादी जल्दी हो गई। उन दिनों परिवारिक पेंशन होती नहीं थी फन्ड आदि का जो पैसा मिला था वह दो शादियो ख़र्च होगया। गांव में खेती बारी से इतनी आमदनी नहीं थी अम्मा और उनके दो लड़के आराम से रह लेते बस काम चल जाता था

यह सब जानने के बाद हमारे स्वभाव तथा व्यवहार में परिवर्तन आना स्वाभाविक था। अतः हम थोडा थोड़ा सुधरने की कोशिश करने लगे।ऊषा भी बहुत दुबली पतली सी थी। थोड़ा पैदल चलने या थोड़ा शारीरिक मेहनत पड़ने पर बहुत थक जाती या बीमार पड़ जाती । ऐसे में अम्मा ने ये सूचना दी कि ऊषा मां बनने वाली हैं, घर में सब खुश थे और हम पता नहीं किस मनोदशा या स्थिति में थे। करते-धरते कुछ नहीं अब एक और जिम्मेदारी। ऐसे में यह विचार बलवान होने लगा कि मुझे अब सुधर जाना चाहिए और पढाई में मन लगाना चाहिए

ई सी सी हमारा पुराना कालेज था।हम यहां के बहुत से छात्रों को जानते थे और बहुत-से छात्र चूकि बांदा, हमीरपुर और फतेहपुर के थे, तथा जो हास्टल में रहते वो हमारे बहुत करीब थे। बिहार और पूर्वी ज़िलों के छात्रों से भी हमारी अच्छी पटती थी। क्यों कि हम भोजपुरी धारा प्रवाह बोल लेते थे। ई सी सी के छात्र संघ के अध्यक्ष एस पी सिंह थे जो बांदा के रहने वाले थे तथा रिश्ते में हमारे चाचा लगते थे। इसलिए वह एस पी चाचा के नाम से बहुत फेमस थे तथा छात्रों के बहुत चहेते नेता थे, उनके खिलाफ कोई चुनाव नहीं लडता था। इसलिए हमको ई सी सी में कोई दिक्कत नहीं आई। हमने बड़ी गंम्भीरता से अपनी पढ़ाई शुरू की। ज्यादा से ज्यादा पढ़ाई में ध्यान देते, कालेज के अन्य क्रिया कलापों में न भाग लेते और न कोई उत्साह दिखाते। इससे जो पुराने `परिचित तथा पापी' थे उन्हे बहुत आश्चर्य हो रहा था। कभी कभी कुछ ब्यंग भी सुनने को मिलते।हम कोशिश करते कि शाम ठीक टाइम पर घर में पहुचे,लेकिन अड्डेबाजी की आदत नहीं छूट रही थी।जब घर देर से पहुंचते तो ऊषा बालकनी में खड़ी हमारा इंतजार कर रही होती।हम डरते-डरते घर में घुसते कमरे पहुंच कर देखते कि डबडबाई आंखों और भरे गले वो पूछती खाना खाइएगा तो बड़ा अपराध बोध लगता था जब मैं पूछता था तुमने खाना खाया तो सिर हिला कर इशारे से कहती नहीं।मै कहता कि खाना ले आओ। फिर वह चौके से खाना ले आती हम दोनों खा लेते। उसकी खामोशी से मुझे डर लगने लगा था।

जैसे जैसे दिन गुज़रने लगे ऊषा की तबियत कुछ ठीक नहीं रहने लगी। कभी कभी उसके नाक से खून निकलने लगा डाक्टरो को दिखाने से पता चला कि ऊषा का बी पी जब बहुत ज्यादा हो जाता है तब नाक से खून निकलने लगता है जिससे उसका बी पी कम हो जाता है। इसलिए ये हैमरेज से बच जातीं हैं। इसके लिए उसे कुछ दवाइयां दी गई और खाने में नमक कम दिया जाय और सुझाव दिया गया कि इनके साथ ऐसा व्यवहार न किया जाए कि इनको गुस्सा आये। तथा इन्हें प्रत्येक हफ्ते महिला रोग विशेषज्ञ डॉक्टर से चेकअप कराया जाय। डफरिन अस्पताल में डॉक्टर मालती बजाज जो कि हमारे एक दोस्त की रिश्तेदार थी और जिन्हें मैं दीदी कहता था, उनके पास ऊषा को चेकअप के लिए ले गये। उन्होंने कुछ दवाइयां लिखी अम्मा को कुछ सलाह दी।जब अम्मा उन्हें फीस देना चाहा तो वो बोली अम्मा ये मेरा छोटा भाई है मैं फीस कैसे ले सकती हूं। अम्मा ऊषा को बहुत प्यार और केयर से रखती थी।हम भी विषेश ध्यान रखते थे कि समय से घर आते कभी कभी छुट्टी के दिन सिनेमा दिखा लाते या चाट खिला लाते। बाबूजी भी हमें सुधरता देख कर खुश थे।

ऊषा को एक बीमारी और थी, सफाई की,हर चीज तरतीब से रखने की,सोने के बाद सुबह चादर, तकिया कम्बल आदि झाड कर लपेट कर उचित स्थान पर रखने,कापी किताबें पढाई की मेज़ ठीक से रखने की, कपड़े और जूते ठीक से तथा लाइन से रखने आदि आदि ।वह बिना बोले हमारे कमरे में सब ठीक ठाक रखती।हम इसके उल्टा थे जो चीज जहां पाते फेंक दिया करते थे। धीरे-धीरे हमारा डिसिप्लिन भी ठीक होने लगा। घर में जितने भाई और बहने थी वो भी देखा देखी अनुशासित हो गये और अपना अपना सामान और कमरे ठीक रखने लगे।ऊषा को खाना बनाने में कम मन लगता था लेकिन बना हुआ खाना टेबल सजाना ज्यादा अच्छा लगता था।वह ज्यादा तर इन्हीं कामों में व्यस्त रहती थी।

घर के बग़ल में एक छोटे चाचा रहते थे तथा सामने एक सरदार अमरजीत सिंह वो दोनों बड़ी सुबह रोज़ संगम नहाने जाते थे।हमने भी उनका ग्रुप जोइन कर लिया।हम उनके साथ सुबह सुबह संगम स्नान करने जाने लगे।सब को बड़ा आश्चर्य था।तथा उनको अजीब लगने लगा कि चन्दू और प्रतिदिन संगम स्नान। कुछ कहते नया नया मुल्ला बना है कुछ दिन का जोश है, कुछ कहते कौवा चला हंस की चाल। लेकिन जब महीनों हो गये तो सबने विश्वास कर लिया और शांत हो गये। हमारे इस कृत्य से या परिवर्तन से बाबूजी बहुत खुश थे।उनको लगा कि उनका शादी वाला प्रयोग सफ़ल रहा।एक आध जगह पर उन्होंने कहा भी,चाहे जैसा बदमाश लडका हो शादी कर देव ठीक हो जाता है ( बदमाश नटवा के गरे मां डइना डार देव तो वह सुधर जात है और सीध सीध चलय लागत है) ।

घर संसार, कालेज और पढाई,रोज संगम स्नान और आध्यात्म सब एक साथ  ठीक-ठाक चल रहा था सिवाय ऊषा की तबियत के।बीच बीच में उसकी तबियत गड़बड़ हो जाती थी। तो भाग डफरिन अस्पताल में डॉक्टर मालती दीदी को दिखाना पड़ता था। इसलिए बाबूजी ने मानिकपुर से एक जीप और ड्राइबर बरकत चचा को भेज दिया था। महीने दो महीने सब ठीक चल रहा था ,अचानक ३ फरवरी १९६५की शाम को ऊषा सीढियां से लुढ़क कर नीचे आ गिरी।इस कारण उसे चोटें आईं और पेट बहुत दर्द हो ने लगा।बरकत चचा ईद की छुट्टी लेकर गये थे।अतः हम जल्दी जल्दी ऊषा को और अम्मा को जीप में बैठाकर डफरिन अस्पताल ले गए डॉक्टर मालती दीदी के पास। उन्होंने तुरंत ऊषा को एडमिट कराया और स्वयं तथा कुछ अस्पताल स्टाफ के साथ ट्रीटमेंट में लग गई। कुछ देर बाद बाहर आ कर अम्मा से बोली, कि प्रीमेच्योर बेबी सात माह का इसलिए थोड़ी परेशानी है लेकिन आप ज्यादा परेशान मत होइए, ईश्वर चाहेगा तो सुबह तक सब ठीक हो जाएगा। अम्मा बोलीं मैं बाहर बहुत चिंतित और परेशान हूं अगर आप कहें तो मैं भी आपके साथ लेबर में चलूं। डॉ मालती बोली चलिए और अम्मा को साथ लेगई।हम जीप पर अकेले बैठे स्टेरिंग पर रख कर भगवान से प्रार्थना करने लगे कि हे भगवान सब ठीक हो। राम राम जपते सुबह हो गई। अम्मा बडी खुश खुश आंई और बोली लडका हुआ है। अम्मा के पीछे पीछे मालती दीदी आंई और मुझसे बोली चन्दू मुबारक हो तुम्हारे बेटा हुआ है।मै जीप से उतर कर अम्मा और मालती दीदी के पैर छुए, और ईश्वर को हाथ जोड़कर धन्यवाद दिया सब अच्छा और शुभ करने के लिए।

फिर ऊषा को एक प्राईवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। वहां मैंने पहली बार अपने सुपुत्र को देखा। बहुत कमजोर और दुबले पतले थे। अम्मा ने बताया कि सात महीने के प्रीमेच्योर है। इसलिए दुबले पतले हैं छय सात महीने में बिल्कुल ठीक हो जायेगे। फिर उन्होंने कहा कि घर जा कर सब को बता दो और मानिकपुर किसी को भेज कर बाबूजी को भी सुसमाचार कहलवा दो। फिर उन्होंने मुझे एक लिस्ट दी कि ये सब सामान घर से ले आना तथा तथा ढेर सारी मिठाई लेआना यहां के डाक्टरों और स्टाफ के लिए।

वह ४फरवरी १९६५ का शुभ दिन था जब मुझे पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। मैअन्दर अन्दर बहुत खुश था लेकिन अभिव्यक्ति नहीं कर पा रहा था। अम्मा के आदेशानुसार मै सीधे घर गया वहां भैया भाभी तथा सभी छोटे भाई बहनों को बताया सभी बहुत खुश हुए।भैया से मैंने कहा कि किसी को मानिकपुर भेज कर बाबूजी को भी खबर करा दे । फिर अम्मा द्वारा बताए सामन घर से लिया और बाजार से पांच किलो मिठाई ली और फिर अस्पताल पहुच गए।उस दिन ईद थी इसलिए बहुत सी मुस्लिम महिलाएं नए जन्में बच्चे को देखने और दुआयें देने आयी क्योंकि उस दिन  अस्पताल में इकलौते ही ये जन्मे थे।दो चार दिन तक तमाम यार दोस्त और शुभचिंतक अस्पताल आते रहे फिर वहां से ऊषा को डिस्चार्ज मिल गया और वो घर आगयी।

बाबूजी जी बहुत ही ज्यादा खुश थे क्योंकि उनको अब तक सब बाबूजी कहते थे, अब उनको बाबाजी कहने वाला आ गया। सबसे कहते इसने मुझे प्रमोशन दिला दिया ,वो इसलिए भी खुश थे कि उनका यह प्रपोत्र अपनी पीढ़ी में अग्रणी है।पूरा परिवार  कौहन से मानिकपुर तक सब बहुत खुश थे। चूंकि ये ईद के दिन पैदा हुए थे तो घर, परिवार के लोग ईदू कहने लगे जो बाद में परिवर्तित हो कर अबू बेन अदम के नाम पर अब्बू हो गया। बाबूजी ने इनका नामकरण "पुनीत कुमार सिंह" किया। इस लिए ये घर परिवार में अब्बू कहे जाते। तथा समाज, स्कूल और सरकारी कागजात में पुनीत कुमार सिंह। अब्बू प्रीमेच्योर पैदा हुए थे इसलिए कमजोर बहुत थे इसलिए अम्मा इनका विशेष ध्यान रखती, सच तो यह है कि ऊषा की भी तबियत ठीक नहीं रहती थी अतः अम्मा को मां बेटे दोनों का ख्याल रखना होता था।चार पांच महीने में अब्बू स्वस्थ्य और चटक होगये। घर संसार ठीक चल रहा था। इस लिए पढ़ाई और कालेज की याद आई।

 बहुत दिनों बाद कालेज पहुंचे तो यार,और मित्रों ने हमें पिता बनने की बधाइयां दी हमने भी कैफटेरिया में सब को चाय मिठाई खिलाई। फिर हमें पता चला कि पढाई में हम काफी पीछे छुट गये है। अतः कुछ सहपाठीयों से नोट्स मांगे।फिलास्फी के टीचर मि. जयसवाल थे जो हमारे बड़े भैया दोस्त थे, उनसे मदद मांगी, वो हमें क्लास के बाद भी गाइड करने लगे। धीरे-धीरे समय बीतता गया और एक्जाम आ गए।हम रात रात भर पढ़ कर ईमानदारी से परीक्षायें दी और अच्छे नम्बरों से पास हो गये।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उरई

मौलवी

भोले बाबा की शरण में - भाग १