भोले बाबा की शरण में - भाग १
गर्मियों की छुट्टियां हो गई थी, प्रतिबंधित होने के कारण हम कहीं जा भी नहीं सकते थे। गर्मी अधिक होने के कारण घर से बाहर खेलने भी नहीं जा सकते थे। ऐसे में अम्मा जिन्हें सब छोटी अम्मा कहते थे, ने हमें गणित और बीज गणित पढ़ाना शुरू कर दिया। उनके पास उनके जमाने की गणित की एक पुस्तक थी श्री चक्रवर्ती द्वारा लिखित, दो महीने में पूरी किताब के सारे प्राब्लम हल करा दिया। जून के आख़री हफ्ते में हमारे छोटे मामा जी आ गए, वो दो दिन मानिकपुर में रुके फिर चले गए। जुलाई माह के पहले हफ्ते में वो फिर आए और उन्होंने बताया कि हमारा एडमिशन उदय प्रताप कालेज वाराणसी में नौवीं कक्षा हो गया है और होस्टल में जगह भी मिल गई है। फिर क्या था तुरंत हमारे कुछ नये कपड़े और वर्दी बन गयी और हमारी बिदाई हो गयी एक बाक्स और एक होलडाल के साथ। काशी बम्बई एक्सप्रेस से हम और मामा जी वाराणसी कैंट पहूंचे फिर वहां से यू पी कालेज। मामा जी यू पी कॉलेज के पुराने छात्र थे उन्होंने यहां से बी ए पास किया था। अतः उनको पुराने स्टाफ के लोग अच्छी तरह से पहचानते थे। वो पहले ही आकर हमारा एडमिशन करा गए थे अतः ...