पुल्ले बाबू
मेरा जन्म कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था अतः मुझे बचपन में पूर्णी नाम से पुकारा जाता था, जो बाद में बिगड़ कर के पुन्नी हो गया ।आज भी मेरे परिवार के तथा बड़े बुजुर्ग पुन्नी कहकर ही बुलाते हैं। मैंने सुना है ज्यादातर लोगों के दो नाम होते हैं, एक घर का और एक स्कूल का। मेरे कई नाम हैं जैसे कुन्डली का नाम इन्द्रजीत, स्कूल में पहले नाम प्रकाश लिखाया गया फिर कक्षा पांच में परिवर्तन कर के चन्द्रभाल हो गया। इलाहाबाद में जब E C C में पढ़ने पहुंचा तो चन्द्रभाल नाम लेने में लोगों की ज़बान को तकलीफ होने लगी और उन्होंने चन्दू नाम रख दिया।
मेरा एक और भी नाम है पुल्ले बाबू।यह मेरा नाम बहुत ही कम लोग जानते हैं,अब तो शायद मेरी पत्नी और मेरे बच्चे ही, क्यों कि उन्होंने मेरे बचपन की कहानियां मेरी मां और बाबूजी से सुनी है। यह नाम देने वाले, मुझे बहुत चाहते और प्यार करते थे, मुझे खूब ढेर सारे सूखे मेवे खिलाते थे - वो थे खूब लंबे चौड़े, अफगानिस्तान के पठान बाबा। पठान बाबा सूखे मेवे के व्यापारी थे और मेरी पैदाइश से पहले से मानिकपुर आते थे। वो तीन-चार बोरे सूखे मेवे लाते और हमारे घर के एक कमरे बोरे रख कर, वहीँ उसी कमरे में कुछ दिन रहते तथा उस मेवे का व्यवसाय करते। वो साल में दो बार आते थे ।
हमारे पिताजी चार भाई थे सबसे बड़े भाई फतेहपुर जिले के कौहन नामक ग्राम में रहते थे जहां के हम मूलनिवासी थे, बाकी तीन भाई व्यवसाय के सिलसिले मानिकपुर आ गए थे । उस समय घर में करीब 6 बच्चे थे। लगभग 3 वर्ष की उम्र से पहले का मुझे कुछ याद नहीं लेकिन परिवार में यह सिखाया गया था की जब कोई बड़ा आए तो उसके पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए। जाड़े के दिन थे, हमको किसी ने एक लंबा सा ऊनी कोट लाकर पहना दिया था जो हमें बहुत प्रिय था । उसे हम हरदम पहने रहते थे और हम उसे झूल कहते थे। हमने घर में पठान बाबा की कहानी सुन रखी थी लेकिन उनको पहचानते नहीं थे। एक दिन अचानक शाम को एक लंबे चौड़े व्यक्ति को घर आते देखा, बाकी बच्चों ने कहा कि पठान बाबा आ गए। जैसा परिवार में सिखाया गया था कि बड़ों के पैर छूना चाहिए हमने दौड़ कर पठान बाबा के पैर छुए। पठान बाबा बहुत खुश हुए और हमें कंधे पर उठाकर नाचने लगे। उन्होंने हमारे बाबू जी से पूछा, "यह पुल्ले बाबू है ना?" बाबूजी के हां कहने पर बोले "ठाकर साब, तुमने अपने बच्चे को बहुत अच्छी तहजीब सिखाई है, तेरा मुंडा शेर बनेगा और बहुत बड्डा अफसर बनेगा "।
वे मेरे पैर छूने से बहुत प्रसन्न और अभिभूत थे।शायद ज़िन्दगी में पहली बार उनकी किसी ने कदमबोशी की थी। तुरंत बोरे से ढेर सारी किशमिश और चिलगोजे निकालकर सब बच्चों बांटा और मुझे अपनी में गोद बैठा कर किशमिश, चिलगोजे बादाम खिलाते रहे और बाकी मेरे झूल के जेब में भर दिए।दूसरे दिन सुबह जब वो अपने मेवे बेचने बाजार जाने लगे तो बाबू जी से बोले "ठाकर साब, पुल्ले बाबू को आज मै घुमाने ले जावांगा, तुम इसकी फिकर मत करना"। बाबूजी बोले "ले जाव" तो खान बाबा ने एक बोरा निकाला जिसमें ढेर सारे सूखे मेवे भरे थे, उसे अपने एक कंधे पर रखा और दूसरे कंधे मुझे बैठा कर, बाजार चल दिए। रास्ते भर आवाजें लगाते मेवे लेलो,बादाम, किशमिश लेलो, अख़रोट, चिलगोजे लेलो। उन्होंने बाजार ही नहीं पूरा गांव मुझे घुमा दिया। हर थोड़ी देर में पूछते "पुल्ले बाबू भूख तो नहीं लगी,अगर लगी हो तो बोर हाथ डाल कर जो हाथ आये खा लो"।चार,पांच घंटे बाद घर वापस आये। बाबूजी ने पूछा कि खान, इसने तंग तो नहीं किया तो ख़ान बाबा बोले "ठाकर साब बहोत अच्छा और तकदीर वाला है पुल्ले बाबू!"
मेरे घर से बाहर इतनी देर रहने पर परिवार के कुछ लोगों को परेशानी थी, लेकिन बाबूजी से कौन कहे क्योंकि बाबूजी की हनक ऐसी थी जल्दी उनका कोई विरोध नहीं करता। इसलिए हम दो दिन और खान बाबा के साथ गांव और बाजार भ्रमण करते रहे और मेवे खाते रहे। तीसरी रात वो अपने व्यापार के लिए किसी रेल गाड़ी से चले गए। सुबह जब मैं जागा तो पता चला कि पठान बाबा चले गये तो मैं बहुत रोया कुछ देर बाद अपने आप चुप भी होगया बाद में पता चला कि पठान बाबा मेरे लिए ढेर सारे मेवे छोड़ गये है।
दुर्भाग्यवश से कुछ दिन बाद मेरे पूरे शरीर में फोड़े निकल आए स्थानीय डॉक्टर से दवा कराने के बाद भी जब कोई फायदा ना हुआ तो बाबूजी मुझे इलाहाबाद ले गए और वहां प्रसिद्ध डॉक्टर घोष को दिखाया। डॉक्टर ने कुछ दवाइयां दी और बाबू जी से कहा की इस बच्चे को बहुत देखभाल ही जरूरत है बाबूजी मुझको लेकर मानिकपुर वापस आ गए। मेरी तबीयत मैं ज्यादा सुधार ना होने से घर में सभी लोग दुखी थी ऐसे मौके पर कुछ लोगों ने खान बाबा पर आरोप भी लगाए की उसी ने कुछ खिला पिला दिया होगा।
हमारा पक्का मकान बन रहा था उसमें एक राजमिस्त्री थे वह शायद बनवासी जाति के थे। मेरी बीमारी तथा मेरे परिवार की परेशानी देखकर उन्होंने बाबू जी से कहा "बाबूजी मैं इनकी बीमारी की दवा कर सकता हूं लेकिन मेरी दवा के बाद पुन्नी भैया ठीक तो हो जाएंगे लेकिन इन्हें गुस्सा सारी जिंदगी बहुत आएगा"। बाबूजी ने पूछा कि तुम्हारी दवा क्या है तो वह बोला "भैया, मैं इनको चने के दाने के बराबर शेर का मांस खिलाऊंगा"। बाबूजी ने पूछा यह कहां से आएगा तो वह बोला कि हम जंगली लोग हैं, हमारे पास यह सब रहता है। मरता क्या न करता, बाबूजी मेरी बीमारी से बहुत दुखी और हताश थे, उन्होंने हां कर दी और कहा कि अगर इसी से इसकी जान बचती है तो तो इसे शेर का मांस खिला दे। वो बाबू जी से एक दिन की छुट्टी लेकर, अपने गांव चला गया फिर जब वापस आया तो उसने एक चम्मच दूध में चने के बराबर अपनी दवा मुझे पिलाई। भाग्य से मैं ठीक होने लगा और करीब एक माह में मेरे सारे फोड़े ठीक हो गए लेकिन मैं बीमारी से बहुत कमजोर और चिड़चिड़ा हो गया था।
मैं, तीन-चार महीनों में बिल्कुल ठीक हो गया उसके कुछ दिनों बाद खान बाबा आए। बाबूजी ने उन्हें मेरी बीमारी के बारे में बताया और कहा कि खान इसे बहुत ज्यादा मेवे खाने के लिए मत देना । खान बाबा बोले "ठाकर साब मुलक का बटवारा हो जाने के वजह से अब आना जाना बहुत मुश्किल हो गया है, दो साल किसी तरह ले दे चल गया । बहुत परेशानी है।" खान बाबा दो दिन रुके, अपना व्यवसाय किया लेकिन इस बार हमको अपने साथ बाजार नहीं ले गए। तीसरे सुबह खान बाबा बाबू जी से बोले "ठाकर साब अब हम जाता है, पुल्ले बाबू को बुला दो", जब मै आया तो मुझे अपने दोनों हाथों से पकड़ कर ऊपर उठा लिया और बड़ी देर तक अश्रु भरी बड़ी-बड़ी आंखों से देखते रहे फिर मुझे एक पोटली दी और बोले "इसमें तेरे लिए मेवे हैं, खाना, तेरी सेहत बनेगी। अच्छा, पुल्ले बाबू, खुदा हाफ़िज़", कह कर चले गये और उन्हें देखता रहा पोटली थामे हुए। उनके जाने के बाद पोटली खोली गई तो उसमें जितने मेवे थे उतने ही सिक्के थे।
खान बाबा फिर तो नहीं आये, उनकी याद आती है पुल्ले बाबू को।
Yeh naam toh pehle kabhi nahi suna maine!
जवाब देंहटाएंक्यूंकि तुम बच्चे नहीं हो...बच्चे के बच्चे हो ;-)
हटाएंसुन्दर ! आज से आपका नाम पुल्ले बापू !
जवाब देंहटाएंआदरणीय भय्या और भाभी,
हटाएंबहुत सुंदर लिखा आपने।
आने वाली पीढ़ियों के लिय
आपसे मानिकपुर और बरवनऔर हरदोई के बारे में और जानना है।
आने वाली पीढ़ियों के लिये निश्चित ही यह महत्वपूर्ण धरोहर साबित होगी।
सादर
मजेदार किस्सा। मजा आ गया पुल्ले जीजा।
जवाब देंहटाएंमजेदार किस्सा। किस्सागोई में आपका जवाब नहीं। आनंद आ गया पुल्ले जीजाजी।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर आदरणीय पुन्नी भैया। ऐसे ही और संस्मरण कृपया ज़रूर लिखें ताकि मानिकपु🌻🌼🏳️🌈🏳️🌈🏳️🌈🏳️🌈र और बरवन, हरदोई के बारे में आने वाली पीढ़ियाँ और जान सकें, अपने इतिहास के बारे में सीख सकें। यह बड़ी ही महत्वपूर्ण धरोहर है, और विरासत है।
जवाब देंहटाएंआपको बहुत-बहुत धन्यवाद ।
आपको और भाभी को सादर चरण स्पर्श आपका छोटा भाई पिंकू और परिवार
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