मौलवी
मानिकपुर से कक्षा 5 पास पास कर देने के बाद हमारा एडमिशन इलाहाबाद के प्रतिष्ठित जमुना क्रिश्चियन हाईस्कूल में कक्षा 6 में करया गया । हमारे बड़े भाई साहब एक वर्ष पूर्व से यही पढ़ रहे थे, वो दसवीं क्लास में थे। वहां हॉस्टल ना होने के कारण, वो आहियापुर के एक पंडित के घर में बने लॉज में रहते थे। इस लॉज में बांदा जिले के कुछ अन्य छात्र तथा सरकारी कर्मचारी भी रहते थे। कुछ समय बाद हमें भी इस लाज में पहुंचा दिया गया और वहां एक कमरे में हम दोनों भाई रहने लगे । उस कमरे में एक एक्स्ट्रा तखत भी पड़ा था। लाज से स्कूल करीब डेढ किलोमीटर दूर था सो हम स्कूल तक पैदल ही आते जाते थे।पढ़ाई मैं हम ठीक-ठाक है लेकिन अंग्रेजी में बहुत कमजोर थे क्योंकि गांव के प्राइमरी स्कूल में कक्षा 5 तक अंग्रेजी भाषा पढ़ाई ही नहीं जाती थी जिसके कारण अंग्रेजी के क्लास में बड़ी कठिनाई होने लगी। इसलिए हमें अंग्रेजी भाषा पढ़ाने के लिए एक ट्यूटर की खोज होने लगी।
उस समय गैस तो होती नहीं थी अतः घरों में खाना लकड़ी या कोयले पर ही बनता था। हमारे बाबूजी जंगल के ठेकेदार थे इसलिए इलाहाबाद के लकड़ी और कोयला के बड़ी टालो में लकड़ी और कोयले के मुख्य सप्लायर थे। तब ट्रक नहीं होते थे केवल रेल गाड़ी से ही लकड़ी कोयला टालों तक पहुंचा था। नार्थ मलाका में एक अलग से रेलवे लाइन थी जिसके दोनों तरफ बड़ी लकड़ी कोयला की टालें थी, यहीं से पूरे इलाहाबाद में लकड़ी कोयला ठेलों पर लादकर घर-घर पहुंचाया जाता था। उन्ही टालों में एक टाल मौलवी साहब का था वो वहीं पर एक कच्चा घर बनवा कर, परिवार के साथ, रहते भी थे। वो हमारे बाबूजी के व्यवसायिक मित्र थे और जमाने के पोस्ट ग्रेजुएट थे। लोग उनको बहुत पढ़ा लिखा मानते थे सो बाबू जी ने उन्हें हमारा अंग्रेजी का ट्यूटर नियुक्त कर दिया।
मौलवी साहब साइकिल से हमें ट्यूशन पढ़ाने आने लगे। पहले दिन उन्होंने हमारी इंग्लिश की किताब का निरीक्षण किया और मुझसे पूछा कि तुमको अंग्रेजी बोलने या लिखने में क्या कठिनाई है? मैंने उन्हें बताया कि मैं हिंदी मीडियम से कक्षा 5 पास करके आया हूं, मुझे अंग्रेजी भाषा के शब्द पढ़ना नहीं आता तथा उनका क्या अर्थ है मुझे समझ नहीं आता। मौलवी साहब बोले यह क्यों नहीं कहते कि पूरे गधे हो तुम्हें गधे से घोड़ा बनाने में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। मुझे उनका गधा कहना बहुत अच्छा नहीं लगा लेकिन किसी तरह करके पढ़ाई शुरू हो गई। मौलवी साहब की कुछ आदतें हमें अच्छी नहीं लगती थीं। एक तो वह बात-बात में गाली देते जैसे गधा, सूअर, हरा* आदि। और दूसरे शायद सुरती खाते थे अतः कमरे में कई जगह थूक कर गंदा कर देते। ऊपर से वो जब आते तो हमारी तेल की शीशी खोलकर तेल निकालकर अपनी दाढ़ी में लगा लेते। क्योंकि वह बाबूजी के व्यवसायिक मित्र थे अतः डर वश उनको कुछ कह नहीं पाते। भैया भी उन को डर के चलते कुछ कह नहीं पाते और इन सब को सहते हुए हम उन् से अंग्रेजी पढ़ते रहे।
वह हरदम कहते रहे की अगला लेसन पढ़ कर रखो, उसमें जो कठिन शब्द हो उनको लिख लो और दूसरे दिन उनका अर्थ हमसे पूछो। इसके अलावा वह हमको ढेर सारा होमवर्क भी दे जाते। अगर कहीं गलती हो जाती तो गधा, कुत्ता आदि कहते और हमारे सर के बाल पकड़ कर दो -चार घूंसे पीठ पर जड़ देते। तीन-चार माह ऐसे ही गुजर गए डर, गुस्सा, गाली और मार खाते हुए। लेकिन अंग्रेजी की पढ़ाई चलती रही।
स्कूल तक पैदल आने जाने से हमारे सैंडल कमज़ोर होकर एक दिन टूट गए। हमने यह बात बड़े भैया को बताया तो वो एक शाम स्कूल से आने के बाद हमें चौक लिवा गए, वहां उन्होंने हमें बाटा शू कंपनी से नए सैंडल खरीदें।उसके बाद उन्होंने चाट भी खिलाई। चौक से आने में देर हो गई तथा थक भी गए थे अतः लॉज में आकर सो गए इसलिए मौलवी साहब का दिया हुआ होमवर्क नहीं कर पाए। दूसरे दिन सुबह जब मौलवी साहब आए तो आते ही पहले हमारी तेल की शीशी से तेल निकालकर अपनी दाढ़ी में लगाया, फिर सुरती थूकते हुए बोले की हमने जो होमवर्क दिया था वह दिखाओ। हमने उनको बताया कि कल हम सामान खरीदने चौक गए थे, आने में देर हो गई अतः देर हो जाने के कारण हम होमवर्क नहीं कर पाए। इतना सुनते ही वह आग बबूला हो गए, और चिल्लाकर बोले "ह** के पिल्ले तुम्हें चौक घूमने का वक़्त था होमवर्क करने का नहीं", इतना कहकर उन्होंने मुझे एक जोर का झापड़ मारा। मैंने उसे कहा कि आप मेरे बाबूजी को गाली मत दो, इतना सुनकर वह और भड़क गया और चिल्लाकर बोला "ह** के पिल्ले ज़बान लड़ाता है" और एक जोरदार झापड़ फिर मारा। मैं तखत के नीचे जा गिरा, फिर चिल्लाकर बोला मैं तुम्हें 100 बार ह** का पिल्ला कहूंगा क्या कर लोगे मेरा। फिर भय और अत्याचार के हद से ज्यादा बढ़ जाने पर जो होता है वह हुआ। मैंने नीचे से अपनी नई सैंडल उठाई और मौलवी साहब के मुंह में दो,तीन जड़ दिए। उसने मेरा हाथ मरोड़ कर सैंडल छीन ली तथा मेरे बाल पकड़ कर मेरी ही सैंडल से मुझे पीटना शुरू कर दिया। ना मालूम यह युद्ध कब तक चलता रहा, लेकिन जब मुझे होश आया तो मैंने देखा कुछ लोग मुझको घेरकर खड़े थे, कोइ पंखा झल रहा था, कुछ मेरे मुंह पर पानी के छिट्टे मार् कर मुझे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। मौलवी साहब जा चुके थे और मेरे दोनों हाथों में मौलवी साहब के दाढ़ी के बाल तथा कुछ खून के छिट्टे थे। मैं समझ गया कि ये छिट्टे किसके हैं।
पूरे लाज के लोग दो भागों में बंटे हुए थे. कुछ कह रहे थे देखो इसे कितनी बुरी तरह से मारा है और कुछ कह रहे थे इसने भी तो मौलवी की आधी दाढ़ी नोच ली है। बड़े भैया बहुत भयभीत थे और कह रहे थे की मौलवी आज ही किसी को मानिकपुर भेजकर बाबूजी को खबर करेगा। फिर बाबूजी आकर इसको और मारेंगे तथा मुझे भी डांट पड़ेगी। यह सुनकर मेरे पीठ का दर्द गायब हो गया और मेरा दिमाग तेजी से काम करने लगा। मैंने सोचा की मौलवी शाम की काशी एक्सप्रेस से किसी को भेजकर बाबूजी को खबर करेगा। खबर पाकर बाबूजी कल सुबह की काशी एक्सप्रेस यहां आ जाएंगे वह करीब 10 बजे यहां पहुंचेंगे फिर मेरी और पिटाई होगी इसलिए मैं दूसरे दिन सुबह 5:00 इटारसी पैसेंजर से मानिकपुर भाग गया ताकि बाबू जी से सामना ना हो सके।
बाबूजी से बड़े उनके मझले भाई जिन्हें सब लोग मझले दादा कहते थे, बच्चों के लिए किला थे। कोई भी गलती करके अगर बच्चे उनके पास पहुंच जाते तो वह उन्हें किसी भी बला से बचा लेते । हमारा घर मानिकपुर में रेलवे स्टेशन के बहुत करीब था। मैं मानिकपुर पहुंचकर स्टेशन से ही रोने लगा मझले दादा मुझे देख कर थोड़ा गुस्सा हुए और बोले "क्यों बे तूने मौलवी की दाढ़ी क्यों उखाड़ ली", मैंने मंझले दादा को पूरा किस्सा बताया और अपनी घायल पीठ दिखाई जो चोट के कारण काली पड़ गई थी। मेरी पीठ की चोट देखकर दादा बहुत गुस्सा हुए और बोले कि हमारे बेटे को इतना मारा और उल्टी शिकायत भी कर दिया। फिर उन्होंने हल्दी चूना गरम करवा कर मेरी पीठ में लगवाया और फिर बोले कि तू चिंता मत कर, अगर तेरे बाबू तुझको डाटेगे या मारेंगे तो मैं उनसे निपट लूंगा।
उधर बाबूजी इलाहाबाद पहुंचकर मौलवी जी की हालत देख बहुत गुस्सा हुए और लाज में मुझे ढूंढने पहुंचे। वहां उन्हें पता चला कि मैं मानिकपुर भाग गया हूं तो वह लौटती ट्रेन से मानिकपुर पहुंच गए। स्टेशन से ही बहुत गुस्से में आए तथा घर पहुंच कर गुस्से में बोले "कहां है वह बदमाश जिसने मौलवी की दाढ़ी नोच ली है?" मैं मझले दादा के पास छिपा हुआ था। मझले दादा ने कहा कि गुस्सा मत करो उस बच्चे की हालत देखी है तुम्हारे मौलवी ने क्या की है। कुछ 50 साल के मौलवी ने 10 साल के बच्चे को चप्पलों से मार-मार के अधमरा कर दिया है। यह कहकर मुझे बाबूजी के सामने घसीट कर खड़ा कर दिया और बोले देखो इसकी पीठ काली पड़ी है और इसके सर के बाल भी नुचे हुए हैं। बाबूजी मुझे मारने के लिए लपके , तो मझले दादा ने उन्हें बीच में ही पकड़ लिया। फिर दोनों भाइयों में थोड़ी देर वाक युद्ध हुआ। लेकिन मैं बच गया। घर में जरूर तीन-चार दिन तनाव बना रहा।
दस दिन बाद मेरी तबीयत ठीक हो जाने पर पुनः मुझे इलाहाबाद भेज दिया गया। कक्षा 6 पास हो जाने के बाद मुझे मानिकपुर बुला लिया गया, और मेरा एडमिशन कक्षा सात में मिडिल स्कूल में करा दिया गया। हमारे करैक्टर रोल में कुछ नंबर और कम हो गए ,घर और समाज में हमारी जो `बदमाशवा' तस्वीर बनी थी वह और भी मजबूत हो गई। मेरे अंदर आज भी द्वन्द होता रहता है कि मैं सही था या गलत। क्या बड़े लोगों को बच्चों को मारने और गाली देने का अधिकार है, बच्चों को कोई अधिकार नहीं है भय और अत्याचार के खिलाफ प्रतिकार करने का?
Dadaji, kisi ko bhi hak nahi kisi aur ko maarne peetne ka, iska umar se koi naata nahi. mera manpasand hissa fir bhi ye thaa hisme aapne dard bhool kar manikpur bhaagne ki planning banayi. uspar badhi hansi aayi.
जवाब देंहटाएंShayad isi liye aapne papa-bua ko apne tarah se paala, uss tarah se nahi :)
जवाब देंहटाएंसुंदर और वीरोचित आत्म कथा
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