कौहन कान्वेंट
हमारा परिवार मूल रूप से फतेहपुर जिले के कौहन ग्राम से आता है। कौहन जमुना नदी के किनारे पर बसा हुआ एक छोटा सा गांव है इसकी आबादी तब लगभग 50 घरों की रही होगी। जमुना के किनारे बसे होने के कारण जमीन हम वार नहीं है कुछ बीहड़ जैसी है। यहां के लोग केवल कृषि तथा पशुपालन पर निर्भर हैं।
हमारे बाबाजी इस गांव के बड़े सम्मानित किसान थे। उनके पास खेती-बाड़ी के लिए काफी जमीन थी तथा ढेर सारे दुधारू पशु और बैल आदि थे। उनके 4 पुत्र थे व्यवसाय की अन्य संभावना न होने के कारण उनके 3 पुत्र व्यवसाय हेतु मानिकपुर चले आए तथा उनके साथ उनके बड़े पुत्र और उनका परिवार कौहन में रह गया। मेरे पिताजी अपने चारों भाइयों में तीसरे नंबर के थे उन्हें सब बाबूजी कहते थे। सबसे बड़े भाई कोपूरा परिवार बड़े दादा कथा उनकी पत्नी को बड़ी अम्मा कहते थे।
इधर मानिकपुर में हमारी पढ़ाई ठीक नहीं चल रही थी| हमारी चंचलता तथा छोटी मोटी शरारतों की सजा हमको स्कूल में ही मिल जाती थी फिर भी मास्टर लोग हमारे पिताजी से आकर शिकायत करते की ठाकुर साहब आपका मझला लड़का पढ़ता कम है बदमाशी ज्यादा करता है, इसीलिए हमारा उप नाम बदमसवा पड गया। बाबूजी मुझसे बहुत दुखी और परेशान रहते थे। ऐसी स्थिति में गांव से बड़े दादा आ गए, बाबूजी ने मेरा दुख अपने बड़े भाई को सुनाया। बड़े दादा ने इस समस्या का तुरंत निवारण बाबूजी को बता या कि गांव में एक स्कूल है जिसमें एक ही मास्टर है किसको सब लोग मुंशी कहते हैं। उस मुंशी ने बड़े-बड़े बदमाश लड़कों को पीठ पीठ के ठीक कर दिया है इसको मेरे साथ कौहन भेज दो इसे वह मुंशी 2 दिन में ठीक कर देगा। अतः तुरंत हमारा ट्रांसफर कौहन कॉन्वेंट मैं हो गया।
दूसरी सुबह हमारा सामान एक बकसियां में रखकर बड़े दादा के साथ हमें कौहन भेज दिया गया। कौहन रात में पहुंचे। गांव में बाबाजी आजी बड़ी अम्मा, दो छोटी बहने और एक छोटा भाई था। गांव पहुंचकर मैं कुछ डरा सहमा और उदास था, बड़ी अम्मा जो ममता और प्यार की सागर थी प्यार से मुझको बुलाकर अपनी गोद में बैठा कर खूब प्यार किया तथा मुझे नहला धुला कर मेरे सर में सरसों का तेल लगा कर बढ़िया कंगी की फिर मेरी दोनों आंखों में बढ़िया काजल लगाया और माथे के ऊपर की तरफ एक चांद बिंदी बनाई। नए कपड़े पहनाकर मुझे स्कूल के लिए तैयार किया, फिर गोद में बैठाकर एक बड़ा गिलास दूध पिलाया। तब तक बड़े दादा का एक सहायक आ गया और मुझे स्कूल ले गया | स्कूल में मुंशी जी विराजमान थे उनसे दादा के सहायक ने बताया की यह प्रधान का भतीजा है इसका नाम कक्षा दूई में लिख लो। "प्रधान यह कहिन है कि ये थोड़ा बदमाश है ए हिका विशेष ख्याल राखेव", इतना कहकर हुए चला गया। उसके जाने के बाद मुंशी जी मेरा बाया कान पकड़कर बोले की तू बहुत बदमाश है यह मै ने सुना है यहां ठीक से पढ़ना नहीं तो कस के ठुकाई होगी। मेरी आंखों में आंसू भरा आए तथा रुधें गले से मैंने कहा की मुंशी जी मैं पढ़ूगा कोई बदमाशी नहीं करूंगा। मुंशी जी मुझको कक्षा दो की क्लास में ले जाकर बच्चों के साथ टाट पर बैठा दिया तथा भय की छाया में हमारी पढ़ाई शुरू हो गई
मुंशी जी बहुत अनुशासित सख़्त और मेहनती व्यक्ति थे। स्कूल में एकलौते अध्यापक थे,न कोई क्लर्क. न चपरासी, न चौकीदार, अकेले ही सारा कार्य स्कुल का खुद करते थे। सुबह आकर स्कूल का ताला खोलते और शाम को ताला बंद कर अपने गांव वापस जाते थे, सुबह समय पर पहुंचे कर फिर स्कूल का संचालन करते।इस बीच पढाई के साथ साथ क्षात्रों की पिटाई खूब करते थे, स्कूल सुबह प्रार्थना से आरम्भ होता और शाम पहाड़ा उच्चारण के बाद बंद होता।दोपहर भोजन अवकाश पर मुंशी जी हमारे घर साइकिल से पहुंचते और भोजन प्राप्त करते ,जब तक हम घर पहुंचे वो बड़ी अम्मा को हमारी पूरी रिपोर्ट भोजन करते समय दे चुके होते थे। बड़ी अम्मा हमें भोजन परोसते परोसते प्यार से कहती जाती या किया करो या न किया करो। मुंशी सिकायत करत रहा है,मैओहिसे कहि दीने हौं कि वा बहुत पियार लरका आय मोर वहिका कुछू न कहा कर। उनकी यह मीठी बातें सुनकर मैं प्रसन्न हो जाता और स्कूल में हुई पिटाई को थोडी देर को भूल जाता।ऐसा रोज चलता रहाता,।
यहां मै ज्यादा खुश था क्योंकि कि यहां मेरी तुलना किसी से नहीं की जाती थी जैसा कि मानिकपुर में था।सब कहते बाबू जी का बड़ा लडका बहुत सीधा है और मझला थोड़ा शरारती औ बदमाश है। इसीलिए भैया को सब ज्यादा प्यार तथा सम्मान करते मुझे कम। इससे मेरे अंदर एक आक्रोष और दुख की भावना घर कर गई थी अतः घर से बाहर कहीं कहीं गडबड हो जाती। इसीलिए मुझे लोग बदमसवा कहने लगे। लेकिन यहां कौहन में मेरी तुलना किसी से भी नहीं होती बल्कि घर में दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई मुझे खूब प्यार और सम्मान देते थे, बड़ी अम्मा तो मुझे बहुत प्यार करती थी इस लिए सब ठीक चल रहा था |
मैं आपको जो बता रहा हूं वाह पिछली सदी के 50 में दशक की बात है मैं मानिकपुर से यहां आया था मानिकपुर में रेलवे स्टेशन था पुलिस थाना था ब्लॉक हेड क्वार्टर था फॉरेस्ट ऑफिस था अस्पताल था तथा दो लड़कों के स्कूल और एक लड़कियों का स्कूल था लेकिन कौहन में ऐसा कुछ भी नहीं था एक प्राइमरी स्कूल कक्षा 5 तक था यह गांव अपनी सदी से 100 साल पीछे था उस गांव में ना कोई सड़क थी, ना कोई सिंचाई के साधन, ना अस्पताल था | विकास का कोई भी काम इस गांव के आसपास नहीं हुआ था यह गांव 18वीं या 19 मी सदी में था लेकिन फिर भी यह गांव स्वयं संपन्न सुपोषित और आत्म निर्भर गांव था अपनी स्कूली शिक्षा के अलावा मैंने इस गांव से बहुत कुछ सीखा जैसे ग्रामीण अर्थशास्त्र ऑर्गेनिक खेती बागवानी गोचरण, छोटे व्यापार में वाटर सिस्टम, आयुर्वेद तथा तालाब और कच्ची सड़कों का श्रमदान करके उनका रखरखाव तथा निर्माण। मैंने वहां सिर्फ 2 साल स्कूली शिक्षा पाई लेकिन छोटी सी उम्र में मैंने उस गांव में जो देखा जो थोड़ा बहुत प्रैक्टिकल सीखा उसका मेरे जीवन पर बहुत असर पड़ा तथा ग्राम ग्रामीण जीवन एवं ग्रामीण विकास पर सेवाकाल में योजनाएं बनाते समय उसका बहुत प्रभाव रहा | मुझे लगता है कि अगर मैं बचपन में ऐसे गांव में 2 वर्ष न विताता तो मैं अपने पूर्वजों के जीवन उनके रहन-सहन उनके संघर्ष और उनके द्वारा किए गए विकास के बारे में मैं जान पाता |
कौहन एक कृषि प्रधान गांव था | यहां पर लगभग सब गांव वालों के पास खेती-बाड़ी के लिए जमीन थी जो बड़े लोग थे उनके पास ज्यादा बड़ी जमीने थी तथा कृषक मजदूर और गांव के अन्य कर्मकरो के पास भी चार पांच बीघे जमीन थी। सिंचाई की व्यवस्था ना होने के कारण यहां पर ज्वार, बाजरा, अरहर, चना, सरसों, तिल, रेंडी, सनयी की खेती होती थी यहां धान और गेहूं की उपज नहीं होती थी। जब फसल कट्ती तो प्रत्येक बड़े किसान के खलिहान से ही पूरी उपज का 20% गल्ला गांव के कर्मकारो जैसे नाई, बढ़ाई, लोहार, केवट, कुम्हार आदि को बराबर बराबर बांट दिया जाता था जिसे यहां जेउरा कहा जाता था इसकी एवज में यह कर्मकार उनकी मदद जरूरत पड़ने पर करते रहते थे तथा रोजाना मजदूरी मैं पुरुष को 6 अंजलि गल्ला तथा महिला को चार अंगुली गल्ला दिया जाता था तथा दिन का भोजन भी उनको प्राप्त होता।
कौहन मैं केवल एक बनिए की दुकान थी जहां लोगों को उनकी जरूरत का सामान मिल जाता था लेकिन इस गांव में लोगों के पास नगद पैसा बहुत कम होता था अतः लोग बनिया के यहां अनाज लेकर सामान खरीदने जाते थे, बनिया को अनाज देते उसके बदले बनिया उनको उनकी चाहत का सामान देता | बनिया उस अनाज को अपने तराजू में तोल के या छोटी-छोटी टोकरीओं में भरकर अनाज का मूल्य लगाता और मूल्य के बराबर ग्राहकों सामान देता, टोकरियों को उनकी नाप के अनुसार कुरुई, कुरवा तथा फायदा कहां जाता। इस गांव में कोई हलवाई की दुकान नहीं थी इसलिए यहां लोग मिठाई से वंचित थे मिठाई के नाम पर इसी बनिया की दुकान में मिश्री गुड तथा गरी मिल जाती थी| इस तरीके से लगभग 90% ग्राहक गल्ला के माध्यम से सपना छोटा-मोटा व्यवसाय या खरीदारी करते थे वह दुकानदार बनिया इकट्ठे हुए अनाज को अपने घोड़े पर भरकर हफ्तेवार बड़ी बाजार, जो असोथर मे थी, वहां ले जाकर बेचता तथा बाजार से ग्रामीणों के जरूरत का सामान लौटते वक्त अपने घोड़े पर ले आता।
कृषि बिना पशुधन के हो ही नहीं सकती, खेत की जुताई बुवाई मड़ाई एवं ढुलाई के लिए बैलों का होना आवश्यक है तथा दूध, दही मक्खन के लिए गाय और भैंसों का होना भी जरूरी है, जो इस गांव में बहुताए में थे सो इनके रखरखाव के लिए गांव में चरवाहे भी थे |हमारे घर पर मुन्नीवा नाम का एक चरवाहा आता था जो हमारे पशुधन की देखभाल करने तथा उन्हें चारागाह व वन में चराने ले जाता था। गायों के छोटे-छोटे बच्चे मुझे बहुत अच्छे लगते थे मैं उनके साथ अक्सर खेलता था। वह चरवाहा मुझे जानवरों की बहुत सी कहानियां सुना था यह भी बताता था की चारागाह या वन में गायों की रक्षा जंगल के जानवर लोमड़ी सियार आदि से कैसे करता था | मैं उसकी कहानियां से बहुत प्रभावित था एक दिन छुट्टी थी तो मैंने बड़ी अम्मा से कहा कि मैं भी मुन्नीवा चरवाहे के साथ गोरू चराने जाऊंगा तथा जंगल में सियार लोमड़ी देखने भी जाना चाहता हूं। पहले तो उन्होंने मुझे मना किया फिर मेरे जिद करने पर मान गई। मुन्नीवा को बुलाकर उन्होंने कहा की इसे भी आज साथ ले जाओ लेकिन जल्दी इसको छोड़ जाना फिर उन्होंने उसको कुछ खाना बाध कर दिया और कहा की अगर इसको भूख लगे तो खिला देना। मैं मुन्नीवा के साथ गोरू चराने के लिए वन में गया। वहां पर कई और चरवाहे अपने अपने जानवर लेकर आए थे। इन सभी चरवाहों ने मिलकर एक बड़ी सी करील के झाड़ को काटकर एक कमरा जैसा बना रखा था जहां पर वह अपना सामान खाना आदि रखते थे, जमीन पर एक टाट बिछा रखी थी , खाना रखकर वह अपने अपने जानवरों के झुंड के पीछे चले गए मैं भी मुन्नीवा के साथ गया | मैंने पूछा जानवरों को तुम कैसे पहचानते हो कि वह मेरे हैं तो वह बोला की मैंने इन जानवरों को नाम दे रखा है और उनके नाम से पुकारता हूं तो वह सुन लेते हैं और जैसा मैं कहता हूं वैसा करते हैं, उसने एक एक गाय का नाम लेकर बुलाया वह आ गई मुझे आश्चर्य हुआ। थोड़ी देर वन में गायों के साथ घूमने के बाद मैंने कहा लोमड़ी, सियार कहां है उसने कहा कि आज ज्यादा शोर सुनकर भाग गए होंगे फिर भी उसने मुझको खरगोश, तीतर और बटेर दिखाएं ,थक जाने के बाद वह मुझको उसी करील की कुंज में ले आया और बोला भैया आप यहां बैठो मैं दूध लेकर आता हूं | थोड़ी देर में वह एक दोने मैं दूध लेकर आया मैंने पूछा यह दूध कहां से लाया तो बोला कलोरी गाय से दुह कर लाया हूं आप दूध गुड और रोटी खा लो, मैंने कहा की मैं कच्चा दूध नहीं लूंगा तब वह बोला दही लेंगे? मैंने कहा हां, वह फिर बाहर गया और कुछ पत्तियां लेकर आया उसने उस दूध में उन पत्तियों का रस निचोड़कर डाला थोड़ी देर में वह दूध जमकर दही बन गया मैं आश्चर्यचकित रह गया। खाना खाने के बाद वह मुझको घर छोड़ गया। मैंने बड़ी अम्मा को यह बात बताई, वो बोली उन्हें पता है कौन सी पत्ती है। मैं अक्सर छुट्टियों में मुन्नीवा चरवाहे के साथ गोचरण हेत वन में जाने लगा | एक बार मेरे बाएं हाथ में एक चाकू से चोट लग गई जिससे मेरे दो उंगलियों में कट गया जिससे काफी खून बहने लगा। मुन्नीमां तुरंत भागकर कुछ घास ले आया और उसे कुचलकर मेरे घाव पर रखकर एक कपड़े से बांध लिया और उसे पानी से गिला कर दिया उसने कहा "भैया परेशान मत होइएगा 3 दिन में आपका यह घाव भर भर जाएगा, बस इसे आप थोड़ा-थोड़ा पानी से गीला करते रहिएगा"। शाम को जब हम घर लौटे तो बड़ी अम्मा को उसने बताया की "भैया को चोट लग गई थी तो मैंने घाव पत्ती बांटकर बांध दिया है 3 दिन में ठीक हो जाएगा"। 4 दिन बाद जब वह पट्टी खुली तो घाव भर गये थे मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। इस तरह मैं मुन्नीवा के साथ गोचरण विद्या सीख पाया।
गांव में पक्का घर बन रहा था ईट का भट्टा घर से गरीब 1 मील की दूरी पर था। भट्टे से गांव तक ईट बैल गाड़ियों से ढोये जा रहे थे। मैं बैल गाड़ियों के साथ कभी-कभी पीके के भट्टे पर आता जाता था | मुझे बैलगाड़ी पर चलना तथा चलाना अच्छा लगता था इसलिए मैंने उन बैलगाड़ी चालकों से कहा की मुझे भी बैलगाड़ी चलाना सिखा दें, वह भी मेरा उत्साह देखकर कभी-कभी मुझे बैलगाड़ी चलाने देते कुछ दिनों में मैं थोड़ा-थोड़ा बैलगाड़ी चलाना सीख गया | गांव के सभी कृषक रेंड़ी तथा सनयी अवश्य बोते। रेडी का तेल हर घर में दीया जलाने तथा बैलगाड़ी के धुरों पर लगाकर पहियों का लुब्रिकेशन करते इसी प्रकार सनई को जमुना में कुछ दिन दबाकर रखते और उससे सन निकालकर रस्सिया टाट पट्टीआदि बनाते। प्रकार यह गांव लगभग अपनी सारी जरूरतों को एक दूसरे की मदद करके अथवा स्वातह निर्माण करके पूरा कर लेते। उस समय यह गांव सुपोषित और आत्मनिर्भर था| यहां संचार की कोई व्यवस्था नहीं थी हफ्ते में एक बार पोस्टमैन आता और गांव वालों की चिट्टियां देता तथा वह साथ में पोस्टकार्ड लिफाफे भी लाता जो गांव वालों को जरूरत के हिसाब से बेंच देता जो लोग उसको चिट्ठी लिख कर देते वह उन्हें अपने साथ ले जाकर पोस्ट ऑफिस में जमा कर देता |
इस गांव में श्रमदान की एक बहुत अच्छी परंपरा थी गांव के लोग तालाब की खुदाई तथा डिसिल्टिंग के लिए प्रतिवर्ष मई माह की पूर्णिमा को पूरे गांव की स्त्रियां और पुरुष इकट्ठे होते | पुरुष खुदाई के औजार जैसे फावड़े कुदाल तथा टोकरिया लेकर आते और स्त्रियां पन्ना और रोटी बनाने का सामान लेकर आती, बच्चे भाग से आम तोड़कर लाते तथा कंडे बीनकर लाते। सारे पुरुष तालाब के बीच की मिट्टी खोद खोद कर भीटो पर चढ़ाते। सारी स्त्रियां आम का पना और रोटियां बनाती, यह काम दोपहर को खत्म हो जाता और सारे लोग मिलकर आम का पना और रोटी खाते | इस प्रकार तालाब की मिट्टी खोदकर तालाब को गहरा बना दिया जाता ताकि बरसात में ताला में पूरा पानी भर जाए किससे साल भर पानी की कोई कमी ना पड़े इसी प्रकार अपने गांव की इकलौती कच्ची सड़क भी श्रमदान के माध्यम से प्रतिवर्ष ठीक कर ली जाती। श्रमदान की यह बहुत अच्छी परंपरा और कहीं नहीं देखी |
इधर हमारी पढ़ाई भी ठीक-ठाक चल रही थी, हम कक्षा दो में पास हो गए थे। छुट्टियों के बाद हमें कक्षा 3 में प्रवेश मिल गया तथा मुंशी जी ने हमें अपनी क्लास का मॉनिटर भी बना दिया, जिम्मेदारी आ जाने तथा हमें थोड़ा सुधार हो जाने से पिटाई में भी काफी कमी हो गई। स्कूल के खेलकूद में भाग लेने, पहाड़ा उच्चारण तथा प्रार्थना में अग्रणी होने के कारण मुंशी जी प्रसन्न रहते और हमारी शिकायतें भी बड़ी अम्मा से बहुत कम करते। हमारी पढ़ाई और समय ठीक-ठाक चल रहा था वार्षिक इम्तहान में हम प्रथम आए जिससे सभी खुश थे। गर्मियों की छुट्टियां हो गई थी लेकिन मेरे सर पर छोटे-छोटे फोड़े निकल आए, जिनकी दवाई स्थानी स्तर पर होती रही लेकिन फोड़े ठीक नहीं हुए | उसी समय मानिकपुर से बाबूजी आ गए उन्होंने मेरे सर का हाल देखकर मुझे अपने साथ मानिकपुर से गए जहां मेरा ऑपरेशन हुआ तथा घाओ भरने में करीब एक महीना लग गया। फिर मेरा एडमिशन कक्षा चार में मानिकपुर में ही करा दिया गया। कौहन के 2 वर्षों में मैंने पढ़ाई के साथ साथ बहुत कुछ सीखा वहां की मीठी यादें आज भी मेरे ह्रदय में हैं।
वाह! very informative !
जवाब देंहटाएंहर एक बच्चे के जीवन में में कम से कम से बड़ी अम्मा ज़रूर होनी चाहिए ❤️
नीतू
कौहन का नाम अभी शायद रामपुर रख दिया गया है न?
जवाब देंहटाएंनहीं कौहन का नाम रामनगर कौहन होगया है
हटाएंकौहन नहीं कउहन होय क चही
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