गुब्बारे


मेरे बचपन में मानिकपुर जंगल के किनारे बसा हुआ एक गांव था। जहां थाना रेलवे स्टेशन अस्पताल रेंज ऑफिस ब्लॉक तथा एक छोटी सी बाजार थी। बस्ती इन्हीं ऑफिसऔर बाजार के आसपास बसी हुई थी। हमारा घर मुसलमानी मोहल्ले में था, जहां पर ज्यादातर मुसलमानों के घर थे दो चार घर छोड़ के। हमारा पक्का मकान था बाकी ज्यादातर घर कच्चे बने हुए थे। बचपन के मेरे दोस्त सलीम भाई का मकान हमारे घर के बगल में था।
मेरे पिताजी जंगल के ठेकेदार थे तथा सलीम भाई के पिताजी रेलवे के कर्मचारी थे। सलीम भाई की मां बहुत गरम मिजाज की थी तथा उनकी जबान भी बड़ी सख्त थी। जब भी वह बोलती तो कुछ सुंदर-सुंदर गालियां उनके मुंह से जरूर बरसती थी। यह तो कहानी के कुछ पात्रों तथा स्थान का सूक्ष्म परिचय था।

कहानी इस प्रकार है की मैं और सलीम भाई अच्छे मित्र थे पड़ोसी से थे तथा कंचा खेलने में पार्टनर थे। सलीम मुझसे लंबे तथा डेबरे थे। डेबरे का मतलब बाएं हाथ से काम करने वाले, इन योग्यताओं के कारण वह बहुत अच्छे कंचा के खिलाड़ी थे। बच्चों के, कंचा खेल ओलंपिक के गोल्ड मेडलिस्ट विजेता थे। ज्यादातर बच्चों के कंचे वह खेल में जीत जाते थे, पार्टनर होने के नाते मुझे भी जीत के आधे कंचे बिना खेले ही प्राप्त हो जाते थे। सलीम भाई के घर के बाहर एक तखत पडा  होता था जिसके एक पावे में एक बकरी हरदम बंधी रहती थी।

एक सुनहरी सुबह स्कूल का बस्ता रख कुछ विलक्षण कंचा खिलाड़ी बगल की गली में एकत्र हुए। जब कंचे का खेल अपने सुरूर पर आ गया तो अचानक सलीम की मां की कर्कश आवाज गूंजी, ए सलिमवा ई एकन्नी तखत मां धरी है जल्दी से जायके छुट्टा पान लाइ आओ। मां की मधुर वाणी सुन सलीम इकन्नी उठा के पान की दुकान की ओर भागे । जल्दी पान की दुकान से एक आने के छुट्टे पान लाकर जो एक ढाक के पत्ते से बंधे हुए थे, तखत पर रखकर फिर कंचे खेलने लगे। बकरी शायद भूखी थी अतः व पान के पत्ते तथा उसके ऊपर बंधे ढाक के पत्ते सहितपान खा गई। थोड़ी देर में मां की आवाज आई सलीम पान लैआयो। सलीम बोले अम्मा पान तखत पर धरे हैं लाइलेव , अम्मा चिल्लाई हिंया पान नहीं है। सलीम बोले अम्मा हम पान तखत मा धरे रहन लागत है बकरी पान खाए गई। इतना सुन अम्मा आग बबूला होई गई और कहिन आवै देव तुम्हारे अब्बा का चप्पलन से पिटवाई करैबे, तुम पान नहीं लायेव एकन्नी के कंचा लाय के कंचा खेलत हौ।हम सब बच्चों ने गवाही दी, अम्मा,सलीम पान लाये रहैऔर तखत धरिन है शायद बकरी खाय गयी होई। गवाही सुनकै अम्मा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।चिल्ला के बोलीं,भागि जाव हियां से सबय,नहीं तो सब कीअम्मा से जाइ के कहब कि तुम्हार लरिकवा पढय नहीं जात कंच्चा खेलत रहत है।यह धमकी सुन खिलाड़ी भाग गये बचे मैऔर सलीम। हम कहां जाते हैं अगल बगल घर था, अतः घर के पिछवाड़े बैठकर सलाह करने लगे की अब क्या किया जाए। सलीम बोले दोपहर में अब्बा आएंगे तो बहुत मारेंगे मेरी एक नहीं सुनेंगे। उसकी यह व्यथा सुनकर मुझे रात में अम्मा ने जो कृष्ण और सुदामा की कहानी सुनाई थी वह याद आ गई। मुझे लगा की मुझको भी सलीम की मदद करनी चाहिए अतः मैंने सलीम भाई को अपना प्लान बताया की कैसे एक आना इकट्ठा करके पान खरीदे जा सकता है क्योंकि यदि मैं घर में अम्मा या बाबू जी से एक आना मांगता तो तुरंत कहते सुबह तुमको अधन्ना।दो पैसे। जेब खर्च के लिए दिए गए थे उनका क्या हुआ और अब फिर एक आना मांग रहे हो, क्या करोगे। इन प्रश्नों से बचने के लिए मैंने एक प्लान बनाया था। उस प्लान को पूर्ण करने के लिए मैंने अम्मा की सिलाई मशीन का एक रील धागा चुपचाप ले लिया। मेरे पास मेरे छोटे मामा का दिया हुआ गुब्बारे का एक पैकेट था वह भी मैं चुपचाप उठा लाया। फिर हम लकड़ी,और बांस के टाल पर पहुंचे और दो बांस निकाल कर क्रास बनाए। क्रॉस रील गुब्बारे का पैकेट लेकर घर से दूर अस्पताल और ब्लॉक के पास जाकर , गुब्बारे फुलाकर रील के धागे से बांध कर उनको क्रास में लटका दिया तथा मैं और सलीम "गुब्बारे ले लो गुब्बारे ले लो चिल्लाते हुए गुब्बारे बेचने लगे", बाजार का दिन था अतः गुब्बारे खूब जल्दी बिक गये।इधर कोई मुझे पहचान गया और उसने जाकर मेरे पिताजी से शिकायत कर दी कि आपका बेटा ब्लॉक के पास गुब्बारा बेच रहा है, पिताजी ने अपने एक सहायक को तुरंत भेजा और कहा तुरंत उसे पकड़ लाओ। 

हमारे सारे गुब्बारे बिक गए थे तथा करीब 30 पैसे का व्यापार हुआ था एक आना पान के लिए निकाल के हम दोनों ने पैसों का बराबर बराबर बटवारा कर लिया और उन पैसों को अपने पैजामा के नारे के साथ भर लिया तब तक पिताजी द्वारा भेजे गए दूत आ पहुंचे वह हम दोनों को पकड़ कर घर ले आए और पिताजी के सामने पेश किया पिताजी ने सलीम को डांट कर उसके घर भिजवा दिया और मुझसे पूछा की स्कूल न जाकर वहां क्या कर रहे थे, वह बहुत गुस्से में थे उनका गुस्सा देखकर मैं कुछ नहीं बोल पाया पिताजी ने मुझे एक जोरदार तमाचा मारा तो मैं गिर पड़ा और मेरी सारी कमाई जो पजामे के नाड़े में रखी थी वह खानखाना कर बाहर गिर पड़ी मेरे पास इतने पैसे देखें पिताजी ने सोचा की इसने यह पैसे कहीं से चुराए हैं और मेरी कायदे से पिटाई शुरू हो गई उधर सलीम भाई जब अपने घर पहुंचे तो उनके अब्बा ने उनकी पिटाई कर दी तथा उन्होंने भी जो माले गनीमत अपने पजामे के नाडे में छुपा रखा था वह बाहर आ कर गिर पड़ा उसके अब्बा ने इतने पैसे देकर यह अंदाज़ लगाया की सलीम और ठाकुर साहब के मझले लड़के ने कहीं मिलकर चोरी की तभी तो इनके पास इतने पैसे निकले, सलीम भाई को पीटते पीटते वह मेरे पिताजी के पास ले आए इधर पिताजी मेरी पिटाई कर चुके थे सलीम के अब्बा ने पिताजी से कहा की यह मझले भैया के साथ मिलकर कहीं चोरी किए हैं तभी तो इनके पास इतने इतने पैसे मिले हैं। मैंने और सलीम भाई ने दोनों बड़ों को बहुत कहा और समझाया की बकरी पान खा गई थी अतः पुनः पान खरीदने के लिए चार पैसे चाहिए थे इसके लिए हमने गुब्बारे बेचे गुब्बारे ज्यादा बिकने लगे तो हमने सारे गुब्बारे बेच दिये। पान के लिए चार पैसे निकाल के हमने बाकी पैसे बराबर बराबर बांट लिए। कहीं चोरी नहीं की। लेकिन बड़ों ने बच्चों का विश्वास नहीं किया और झूठ बोलने का इल्जाम और लगाकर थोड़ी और पिटाई कर दी।

मैं बड़े होने के बाद भी हरदम यह सोचता रहा की मित्र की सहायता और मदद करके मै कहां गलत था।

टिप्पणियाँ

  1. गुब्बारे वाली कहानी ब्लॉग पे पढ़ के बहुत अच्छा लगा

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  2. कहानियाँ पढ़ कर ऐसा लग रहा है की मैं आपके सामने बैठी हूँ। ग़ुब्बारे एंव मौलवी जी की कहानी में बच्चों का नज़रिया बहुत ख़ूबसूरती से आया है। अगले एडिशन के लिए उत्सुकता से इंतज़ार है अंकल!

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